भीमा कोरेगांव हिंसा की असली जड़ कोई एल्गार साजिश नहीं, सवर्ण हिंदुत्व दबदबा है

PHOTO BY NIKHIL GHORPADE

यह एल्गार परिषद/भीमा कोरेगांव मामले पर तीन हिस्सों वाली अनुसंधान सीरीज़ की पहली रिपोर्ट का हिंदी अनुवाद है। यह रिपोर्ट मूल रूप से फरवरी 2025 में अंग्रेजी में प्रकाशित हुई थी। अनुवाद में आने वाले अगले हिस्सों के लिए द पोलिस प्रोजेक्ट को सब्सक्राइब करें।
अंग्रेज़ी से अनुवाद: मनीष आज़ाद 

“कुल्हाड़ी को अभी मेरी आदत नहीं
उसका घाव देह में मेरी उतना गहरा नहीं

आम जन का येलगार उठ रहा है
ये कोई श्रेष्ठ केंचुओं का भोंदू जमाव नहीं “

एक मराठी ग़ज़ल के ये दो शेर कुछ लोगों को ज़रा तीखे लग सकते हैं. लेकिन शोषित-पीड़ित लोगों के भीतर ये आक्रोश की तीखी लहर छेड़ पाते हैं. पहला शेर इस ग़ज़ल का मुखड़ा है और दूसरे शेर में जो आह्वान है, वही इसे नाम देता है – येल्गार; मराठी में एलगार. इस ग़ज़ल के रचयिता महाराष्ट्र के अमरावती में ब्राह्मण परिवार में जन्मे एक कवि सुरेश भट हैं. उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया था. आज नागपुर में उनके नाम का एक प्रतिष्ठित सभागार है – कविवर सुरेश भट सभागृह. इस सभागार का उदघाटन सितंबर 2017 में उस समय के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने किया था. ब्राह्मणवादी धुर दक्षिणपंथी मुख्यालय के बेहद क़रीब स्थित है यह.  

उस साल के अंतिम दिन, विवादास्पद ‘एल्गार परिषद’ ने भारत में लोकतंत्र की रक्षा के लिए एक सार्वजनिक सभा आयोजित की थी. आयोजन पुणे शहर के बिल्कुल बीच में पेशवाओं की राजधानी शनिवारवाड़ा की भव्य प्राचीन ईमारत में किया गया. अगले ही दिन, पुणे के प्रशासनिक क्षेत्र से बाहर, शहर से लगभग तीस किलोमीटर पूर्व दिशा की ओर, भीमा नदी के किनारे बसे एक विकसित गाँव कोरेगांव में हिंसा भड़क उठी. भीमा कोरेगांव लंबे समय से सर्वाधिक उत्पीड़ित जातियों और फुले–अंबेडकरवादी विचारधारा के वाहकों के लिए एक पवित्र, राज्य-प्रायोजित स्मृति-स्थल रहा है.

200 साल पुराने विवादित कथानक की उत्पत्ति की खोज 

वह ईस्ट इंडिया कंपनी की एक छोटी बटालियन थी जिसमें करीब 800 सैनिक थे. इस टुकड़ी में  ज़्यादातर दलित-बहुजन शोषित समुदायों से आने वाले लोग शामिल थे, जिनमें सबसे बड़ी संख्या महार जाति की थी. 1 जनवरी 1818 को इस टुकड़ी ने इसी कोरेगांव में 30,000 सैनिकों की विशाल युद्धोन्मत्त सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था. जंग के मैदान में ऊँची जाति के वे ब्राह्मण सेनापती इस विशाल सेना की अगुवाई कर रहे थे. वे उस समय विराजमान, बहुत सारों की घृणा के पात्र पेशवा बाजीराव द्वितीय के वफादार थे. यूँ तो ईस्ट इंडिया कंपनी सबसे भरोसेमंद सहयोगी और उदार संरक्षक थी पेशवाओं की, जो कि शिवाजी और संभाजी भोसले के मराठा शासन के दौरान प्रधानमंत्री होते थे. ऐतिहासिक दृष्टि से कहें, तो पेशवा और अंग्रेज़ों के बीच सामान्यतः बने रहने वाले अनुकूल रिश्तों में आई सामयिक विसंगति अंग्रेज़ों की उपनिवेशवादी सत्ता के निरंतर विस्तार की मुहीम की राह में कोई बड़ी बाधा नहीं थी. दलील यह भी दी जा सकती है कि बाजीराव द्वितीय की ही चालों से उत्पन्न क्रिया-प्रतिक्रिया के फलस्वरूप बरतानवी साम्राज्य ने ‘बॉम्बे प्रेसीडेंसी’ के रूप में अपनी एक संगठित राजनीतिक व्यवस्था की नींव रख दी.

कोरेगांव की जंग, खासकर भारत के उत्तर-औपनिवेशिक काल में, सायास एक दंतकथा के समान प्रसिद्धि हासिल करती गई. इस विजय को केवल सामरिक अर्थ में ही नहीं देखा गया. यानी यह केवल नदी पार के एक गाँव की चौकी की वीरता से रक्षा करने भर में सफलता नहीं थी. यह जीत थी जाति, जेंडर और सम्प्रदाय विशेष के साथ हो रहे उन वीभत्स अन्यायों के ख़िलाफ़ भी, जो शिवाजी-संभाजी के बाद के पेशवाई शासनकाल में लगातार बढ़ते गए थे. पिछले कम से कम चार दशकों से, महाराष्ट्र की अलग-अलग सरकारें हर साल 1 जनवरी को वहाँ शहीद स्मारक पर श्रद्धांजलि देने आने वाली भीड़ के लिए प्रबंध सुनिश्चित करते आये थे. लोग सुबह से देर रात तक बड़ी नियमबद्धता के साथ हर 1 जनवारी को वहाँ जुटते. 2018 में, कोरेगांव की जंग की 200वीं वर्षगाँठ पर भी हमेशा की तरह शांतिपूर्ण भीड़ जुटी. लेकिन इस बार संख्या बढ़कर 5 लाख से भी ज़्यादा थी. 

कोरेगांव की जंग किसी दंतकथा का दर्ज़ा हासिल कर चुकी थी. जंग की याद में कोरेगांव में एक शहीद स्मारक बनाया गया है. यहाँ हर साल 1 जनवरी को हज़ारों लोग श्रद्धांजलि देने आते हैं.
फोटो: निखिल घोरपड़े

लेकिन जो एल्गार परिषद आयोजित हुई, वह हमारे आपराधिक न्याय तंत्र की भूलभुलैया में 2018 के भीमा-कोरेगांव दंगा-फ़साद का पर्याय बन गई. हिंसा के लिए विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ताओं को ज़िम्मेदार ठहराया गया. बाद में उन्हें ‘भीमा-कोरेगांव 16’ या ‘बीके 16’ कहा जाने लगा. उनमें एल्गार परिषद के आयोजक भी थे और वे लोग भी जिनका परिषद से कोई संबंध नहीं था. नामचीन मानवाधिकार कार्यकर्ता अचानक रातों रात आतंकी साज़िश के आरोपी बना दिए गए. अभी हाल में रिहा हुए एल्गार परिषद के प्रमुख आयोजकों में से एक सुधीर ढवले का कहना यही होगा कि एल्गार परिषद का उद्देश्य था – जनता में उस शौर्य का मूल्य संचारित करना, जिसकी मिसाल उस छोटे से वैविध्यपूर्ण दल ने अपने दलित पूर्वजों से मिली शक्ति के बदौलत बाजीराव द्वितीय की विशाल पेशवा सेना के ख़िलाफ़ पेश की थी. 

पेशवा शासन का अधःपतन ऐतिहासिक अभिलेखों से पुष्ट होता है – उसकी सेना के सभी ओहदे सिर्फ़ और सिर्फ़ ब्राह्मण सेनापतियों के हाथ में थे, जबकि सैनिकों की भर्ती दक्षिण के सामंती सरदारों ने मुहैया कराई थी. हमलावरों के तौर पर तबाही मचाने के लिए भाड़े की अरब घुड़सवार टुकड़ी थी. गुज़री पीढ़ियों के मराठी आलोचकों के अनुसार, सेना की शाही शानो-शौकत असल में प्रतिगामी सामाजिक व्यवस्था का ही प्रतिबिंब थी. वहाँ की सबसे बड़ी वंचित जाति महारों को हथियार रखने तक की अनुमति नहीं थी. उन्हें सेना से बाहर रखने का बाक़ायदा फ़रमान था, जो कि शिवाजी और संभाजी के दौर की मावला मराठा फ़ौज से बिल्कुल भिन्न था, जिसमें महारों में से कुछ लोग अधिकारी तक बन सकते थे. पेशवा राज में सामाजिक ऊँच-नीच के नियम बेहद कठोर थे. इस बात का हवाला सावित्रीबाई फुले की किशोरवय छात्रा मुक्‍ता साल्वे (जो एक दूसरी दलित जाति मांग से थीं) के लेखन से मिलता है. वह लिखती हैं कि अगर कोई महार या मांग पुणे में किसी व्यायामशाला के पास से गुज़रने की हिमाक़त करता, तो उसका सिर धड़ से काट कर गेंद बनाकर खेला जाता. राज्य के सैनिक तलवारों को बल्ला बनाकर उसे पहाड़ी ढलान से नीचे लुढ़काते. स्त्रियों के साथ जहाँ खरीदी-बेची जाने वाली वस्तु के समान व्यवहार होता था, वहीं ताकतवरों का व्यभिचार गर्व की बात माना जाता.

दुर्भाग्य से बाजीराव द्वितीय के विचारधारात्मक उत्तराधिकारी, आज की अति-सक्रिय हिंदू राष्ट्रवादी टुकड़ियाँ उसी अतीत के चश्मे से आज के भेद-भाव देखते हैं. कोरेगांव की जंग में बाजीराव द्वितीय की हार के प्रति बेहद भावुक होकर वे अपने पूर्वजों का गौरव खो जाने पर, एक किस्म की सत्यनिष्ठता के साथ, रंज पालते हैं, और अपनी इस ब्राह्मणवादी राष्ट्रवादी बातफ़रोशी को उचित ठहराने के लिए वे 1818 की जंग में विजयी ईस्ट इंडिया कंपनी के उपनिवेशवादी चरित्र को भी अपनी राजनीतिक दलीलों में शामिल करते हैं. मराठा राजा शिवाजी और संभाजी भोसले का वंशीय और सामाजिक सम्बन्ध शूद्रों के अधिक समीप था, जो हिंदू वर्ण व्यवस्था के सामाजिक श्रेणीक्रम में चौथे पायदान पर आते हैं. 1818 की जंग से लगभग सौ साल पहले मराठा साम्राज्य के प्रधान मंत्री (पेशवा) सत्ता में ऊपर उठते-उठते, राजा बन गए थे, और उन्होंने एक नया वंशानुगत शासन स्थापित किया था. बहु-स्तरीय समाज में धर्म द्वारा अनुमोदित सबसे ऊँचे पायदान पर आसीन ये पेशवा उच्च-पदस्थ ब्राह्मण जाति से ही आते थे.

अतः भगवा खेमे के लिए यह विमर्श वैचारिक चारे का काम करता है, जिसके दम पर एक ओर ख़ुद को पीड़ित दिखाने और दूसरी ओर इसी बात का आक्रामक रूप से बदला लेने का बहाना बन जाता है. निशाने पर अक्सर वे लोग होते हैं जो पहले से ही शोषित और हाशिये पर ढकेले हुए हों. ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि ऐसे दबंगई वाले माहौल में, चाहे वह कोरेगांव के आसपास हो या पुणे से सुदूर कोई जगह, संवैधानिक तौर पर अस्पृश्यता का उन्मूलन कर दिए जाने का तथाकथित पूर्व-अछूत जातियों और चौथे पायदान के शूद्रों के लिए असल जीवन में कोई ख़ास असर नहीं पड़ा है. भारतीय संविधान के दायरे में जाति व्यवस्था की कालातीत हो चुकी प्रथाएँ हों या चातुर्वर्ण का धर्मावलंबी सिद्धांत, किसी के भी उन्मूलन की चर्चा आज तक कभी नहीं हुई है. 

इसलिए जब तथाकथित पूर्व-अछूत लोग अपने रोज़मर्रा के जीवन में आकाश का थोड़ा-सा और हिस्सा पाने के लिए संघर्ष कर रहे हों, तो उन्हें पेशवाशाही की ज़रा-सी भी झलक दिख जाने पर वह घृणायोग्य, वीभत्स और नाक़ाबिले बर्दाश्त मालूम होती है. वहीं दूसरी ओर, कविवर सुरेश भट से विपरीत, ऊँची जातियों का ऊपर उठता हुआ असंवेदनशील तबक़ा अक्सर ऐतिहासिक रूप से प्रतिगामी बिंबों-प्रतिमानों के इर्द-गिर्द इकट्ठा हो जाता है. आज की प्रभुत्वशाली विचारधारा की सत्ताओं से बल पाकर हिंदुत्ववादी दक्षिणपंथ ने हाल के वर्षों में पुणे शहर के तेज़ी से विकसित हो रहे सीमांतों पर राजनीतिक वर्ग और सामंती पूँजीपति तबक़ों के साथ अपने गठजोड़ का आकार बढ़ाने के लिए अनुकूल स्थितियाँ पायी हैं. इस परिस्थिति में इतिहास के गहन सवालों और सामाजिक सद्भाव से संबंधित अनसुलझे मसलों की तोड़-मरोड़ करने और उनकी झूठी व्याख्याएँ पेश करने में लाज़िमी तौर पर आसानी थी. 

इस मंज़र में भट की ग़ज़ल इसलिए मायने रखती है, क्योंकि यह भारत के वंचितों के सबसे निचले तबक़ों के उत्थान में अम्बेडकर के योगदान का सम्मान करती है. उनकी ग़ज़ल के “आम जन” के “येलगार” पर आज आरोप है एक अराजक भीड़ की सिलसिलेवार हिंसा की अगुवाई करने का. स्पष्ट है कि यह उन “श्रेष्ठ केंचुओं” के जुर्म को सरेआम माफ़ करने के लिए छोड़ा गया धुआँ ही था, जो उत्पीड़ितों के बीच बढ़ते रोष को सहन नहीं कर पा रहे थे. यहाँ ग़ज़लकार की बात पर ग़ौर करने में ही बुद्धिमानी दिखायी देती है. उस येलगार के जवाब में श्रेष्ठजनों की विध्वंसक प्रतिक्रिया के लिए किसे ज़िम्मेदार ठहराया जाना चाहिए – वंचित लोगों को या संपन्न लोगों को? क्या न्याय की देवी नंगी सच्चाई को भी नहीं देखना चाहती? आँखों पर पट्टी बाँधे तराज़ू को तौलने वाली न्याय की देवी क्या इतनी नीची गिर सकती है कि वह ऐसे किसी प्रशासनिक तंत्र को क्षमा कर दे जिसने उन्मत्त भीड़ के साथ पर्दे की आड़ से गठजोड़ कर लिया हो? 

फ़ोटो : निखिल घोरपड़े 

भीमा कोरेगांव हिंसा की पड़ताल करता जाँच आयोग

इन सवालों के जवाब आज तक अधर में लटके हुए हैं, क्योंकि 2018 की भीमा कोरेगांव की हिंसा के कुछ एक-आध महीने बाद राज्य सरकार द्वारा गठित जाँच आयोग की रिपोर्ट का अभी भी इंतज़ार है. नीले झंडे थामे हुए महाराष्ट्र विधानसभा की ओर कूच करने वाले प्रदर्शनकारियों को दिलासा देने के लिए इस अर्द्ध-न्यायिक निकाय का गठन किया गया था. इसे न्यूनतम आवश्यक सुविधाएँ तक उपलब्ध न किए जाने के चलते अपनी जाँच शुरू करने में लगभग छः महीने लगे थे. आयोग की जाँच के दायरे में अन्य बातों के साथ-साथ, दो मुख्य बातें शामिल थीं. पहली, हिंसा के कारणों, उससे जुड़े घटनाक्रम और ज़िम्मेदार समूहों तथा व्यक्तियों की पहचान करना. दूसरी, हिंसा पर पुलिस की प्रतिक्रिया पर्याप्त थी या नहीं, इसका मूल्यांकन करना. सात-आठ साल बीत जाने और सोलह बार समय-सीमा बढ़ाए जाने के बाद, आयोग की सुनवाई अंततः फरवरी 2025 में समाप्त हो चुकी है.

हिंसक दंगे को अंजाम देने वालों के पीछे कथित षड़यंत्रकारियों मिलिंद एकबोटे और संभाजी भिड़े को गिरफ़्तार  करने के लिए आज लोगों की ओर से कोई वैसी ज़ोरदार मांग या दबाव दिखाई नहीं देता जैसा आयोग के गठन के समय था. हिंदुत्व संगठनों ‘समस्त हिंदू आघाड़ी’ और ‘शिव प्रतिष्ठान हिंदुस्तान’ के नेता क्रमशः मिलिंद एकबोटे और संभाजी भिड़े ने भीमा कोरेगांव स्मरण समारोह का लगातार विरोध किया है. एकबोटे और भिड़े इस वार्षिक सभा को हमेशा से देशद्रोही गतिविधि मानते रहे हैं, क्योंकि दोनों ही पेशवाओं के प्रशंसक रहे हैं. जबकि इस वार्षिक समारोह में पेशवाओं की, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से, निंदा लाज़िमी होती. दरअसल एकबोटे ने यह बात ‘समस्त हिंदू आघाडी’ के लेटरहेड पर 29 दिसंबर 2017 को पुणे ज़िलाधिकारी को लिखे अपने एक पत्र में कही थी. उसी दिन वढु बुद्रुक में हिंसा हुई थी. उन्होंने लिखा – “इस कार्यक्रम में बाजीराव पेशवे, नारायणराव पेशवे, माधवराव पेशवे जैसे पेशवाओं को बदनाम करना एक प्रवृत्ति बन गई है, जिन्होंने महाराष्ट्र के लिए उत्कृष्ट काम किया है. इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेशवाओं की गौरवशाली परंपरा का अपमान किया जा रहा है.”

2018 में भीमा कोरेगांव में इतिहास से जुड़े मुद्दे सचमुच दाँव पर लगे हुए थे. उस 1 जनवरी को समाज में स्पष्ट ध्रुवीकरण दिखाई दे रहा था. एक ओर सुनिश्चित भगवा दृष्टिकोण से की जाने वाली साम्प्रदायिक राजनीतिक व्याख्याओं के साथ हिंदू समाज का प्रभावशाली हिस्सा था. दूसरी ओर नव-बौद्ध समुदाय, जिसका प्रतिनिधित्व नीले अंबेडकरवादी झंडे कर रहे थे, साथ ही यहाँ-वहाँ पाँच रंगों में पंचशील ध्वज भी – मानवता के सम्यक पाँच सद्गुणों के प्रतीक. प्रशासन ने चतुराई से उस समय हिंदुत्व के पुरोधाओं की खाल बचा ली, चूँकि मुख्यमंत्री ने भिड़े को “सबूतों के अभाव” का हवाला देते हुए क्लीन चिट दे दी थी और एकबोटे को भी सिर्फ़ एक महीने की हिरासत के बाद न्यायिक जमानत मिल गई.

भीमा कोरेगांव में भीड़ की हिंसा के मामले में आयोग की सुनवाई अंततोगत्वा सितम्बर 2018 में शुरू हुई. कोलकाता उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जे एन पटेल इसके अध्यक्ष रहे और महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्य सचिव सुमित मलिक इसके दूसरे सदस्य. अब आयोग से यह उम्मीद की जाने लगी कि वह इस बहु-स्तरीय टकराव की परतें खोलेगा, जिसे पुलिस तंत्र के एक हिस्से ने हास्यास्पद रूप से माओवादी साज़िश का नतीजा बताने की कोशिश की.

आप याद कर सकते हैं कि कैसे 2018–2019 के दौरान राष्ट्रीय मीडिया में एल्गार परिषद मामले को लेकर हंगामा खड़ा कर दिया गया था. अगस्त 2018 में महाराष्ट्र पुलिस के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (क़ानून और व्यवस्था) परमबीर सिंह ने मामले में दूसरे दौर की गिरफ़्तारियों के तुरंत बाद बुलाई गई एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में मीडिया ट्रायल शुरू कर दी थी. उन्होंने एक अपराध-मूलक पत्र के अपुष्ट हिस्से को पढ़ कर सुनाया. यह दावा किया कि इसे इस केस के एक आरोपी रोना विल्सन के लैपटॉप से बरामद किया गया है. लेकिन बाद की फॉरेंसिक जाँचों से यह सामने आया कि रोना विल्सन का सिस्टम एक ऐसे मालवेयर का शिकार था, जिससे उनके लैपटॉप और बाहरी स्टोरेज डिवाइसों तक दूर से पहुँचा जा सकता था और मनचाहे तरीक़े से सबूतों को गढ़ा जा सकता था. लेकिन परमबीर सिंह ने निस्संकोच होकर विल्सन पर यह आरोप लगा दिया कि वे प्रतिबंधित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेताओं के साथ मिलकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साज़िश रच रहे थे, और इसके अलावा वे जंगलों में चल रहे छापामार युद्ध के लिए उच्च श्रेणी के हथियारों और गोला-बारूद की नामालूम कारणों से ख़रीदारी की कोशिशों में भी शामिल थे. पत्र मनगढ़ंत तो था ही. सरासर झूठी बातों को कुछ परिचित नामों और कहीं-कहीं विकृत तथ्यों के साथ मिलाकर तैयार किया गया यह पत्र उन्नत साइबर जासूसी तकनीकी के सहारे उनके सिस्टम में डाला गया था.

जनवरी 2025 में बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश से सुधीर ढवले और रोना विल्सन लगभग सात साल की क़ैद के बाद आखिरकार ज़मानत पर रिहा हुए. (फिर ज्योति जगताप, महेश राउत, हैनी बाबू, और हाल ही में रमेश गाइचोर और सागर गोरखे भी ज़मानत पर रिहा हुए). अभी अकेले सुरेंद्र गडलिंग अंदर हैं. तो क्या उनके लिए जेल की सलाखों के बीच की ठंडी खलाओं के पार कोई आशा की किरण दिखायी देने की उम्मीद की जा सकती है, जबकि उनके लिए न्याय का पहिया इंतहाई धीमी गति से चल रहा हो और असहनीय लंबी प्रतीक्षा के पल ख़त्म होते दिखायी ना देते हों?

फ़ोटो: निखिल घोरपड़े 

शायद आने वाला वसंत उम्मीद लेकर आये. जाँच आयोग के समक्ष दर्ज हुए समूचे साक्ष्य में, जिसे कि पॉलिस प्रोजेक्ट ने ग़ौर से देख लिया है, रत्ती भर भी ऐसा प्रमाण नहीं है जो भीमा कोरेगांव के हिंसक दंगे और एल्गार परिषद के बीच किसी तरह के संबंध को दर्शाता हो. वस्तुतः इस मनगढ़ंत कहानी में जो आरोप लगाए गए हैं, वे जिन पुलिस अधिकारियों के हैं उनका अधिकार-क्षेत्र पुणे शहर तक का ही था. हिंसा जिस ग्रामीण परिवेश से उभरी वहाँ उन्होंने कोई तफ़तीश कभी की ही नहीं है. कुल 53 गवाहों में से 13 पुलिस अधिकारियों ने आयोग के समक्ष अपनी गवाहियाँ दर्ज कीं और हलफ़नामे भी प्रस्तुत किए हैं. उनमें से एक भी अधिकारी यह नहीं बता सका है कि हिंसा का कथित कारण एल्गार परिषद और भीमा कोरेगांव व उसके आसपास के क्षेत्रों में उसके कथित परिणाम (जिसकी बाद में पुणे ज़िले और राज्य भर में प्रतिक्रिया हुई) के बीच कोई संबंध था.

आयोग के सामने गवाह नम्बर 48 एल्गार परिषद केस का जाँच अधिकारी, पुणे पुलिस के शिवाजी पवार थे, जिन्होंने 2018 जून के आरम्भ और अगस्त के अंत में बीके 16 में से संदेह का हवाला देकर 10 को गिरफ़्तार किया है. पवार ही पहली दो चार्जशीटों के लेखक भी हैं, जो 15 नवम्बर 2018 और 21 फ़रवरी 2019 को फ़ाइल की गईं. जाँच उसके बाद अगले साल एनआईए को सौंपी गई. शिवाजी पवार ने आयोग के सामने बहुत साफ़ तौर पर यह स्वीकार किया है कि 1 जनवरी 2018 को भीमा कोरेगांव के इर्द-गिर्द भड़कने वाली हिंसा के किसी भी चश्मदीद गवाह को वे नहीं पहचान नहीं सकते हैं. इस स्वीकारोक्ति का मतलब यह हुआ कि हिंसा का शिकार हुए और चश्मदीद गवाह रहे किसी का भी एल्गार परिषद से कोई ताल्लुक़ नहीं है. इससे यह साबित हो जाता है कि भीम कोरेगांव की हिंसा का एल्गार परिषद से कोई सम्बन्ध नहीं है. उन्होंने यह भी स्वीकार किया है कि एल्गार परिषद के बाद पुणे ज़िले के विभिन्न थानों में दर्ज हुए हिंसक दंगों की 36 FIRs को उन्होंने 8 जनवरी 2018 तक, जिस दिन विश्रामबाग पुलिस स्टेशन में सुधीर ढवले और अन्य के खिलाफ़ अजीबोग़रीब-सा मुक़दमा दर्ज किया गया, देखा तक नहीं था.

विश्रामबाग केस को यदि सही माना जाये, तो उससे निकले अनुमान के आधार पर, पुणे ज़िले के इनमें तीन मामलों में एल्गार परिषद के दौरान उकसावे के कथित षड़यंत्र के क्रम में, परिणति के तौर पर घटित हुए कृत्य दिखायी देने चाहिए थे. सच तो यह है कि आयोग के सामने आए उन 36 में से 33 केसों में मिलिंद एकबोटे के नेतृत्व वाले दक्षिणपंथी अतिवादियों को दोषी माना गया है और संभाजी भिड़े का नाम भी इसी रूप में कई बार आया है. सिर्फ़ शेष तीन मामलों में हिंसक दंगों के लिए दलितों को ज़िम्मेदार बताया गया है. और ये सभी 1 जनवरी के हिंसक दंगों के चंद दिनों बाद हुए जवाबी प्रदर्शनों से सम्बंधित हैं, न कि 1 जनवरी के हिंसक दंगों का अंग. इन तीनों मामलों का (पुलिस के आरोपों में भी) 31 दिसंबर 2017 की एल्गार परिषद के मंच से दिए गए भाषणों या अन्य किसी कार्यक्रम से, कल्पना की अंतिम हद तक भी, कहीं कोई संबंध जुड़ नहीं पाता है.

आयोग के सम्मुख जाँच के लिए प्रस्तुत हुए अधिकांश पुलिस अधिकारी हिंसक दंगे के कारणों को ठीक-ठीक चिह्नित करने में असफल रहे हैं. इस बात का भी उनके पास कोई जवाब नहीं था कि उन्होंने एल्गार परिषद की सामग्री, लहजे या अंदाज़ को लेकर एक भी आधिकारिक FIR क्यों दर्ज नहीं की थाई? वे यह भी नहीं बता सके कि निर्माण क्षेत्र के एक व्यापारी तुषार दामगुड़े की एक सामान्य निजी शिक़ायत कैसे एल्गार परिषद मामले का आधार बन गई और कैसे उसी के आधार पर 16 मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया गया.

दामगुड़े की शिक़ायत एल्गार परिषद में व्यक्त किये गए रैडिकल आंबेडकरवादी विचारों के प्रति एक धुर दक्षिणपंथी प्रतिक्रिया मात्र थी. शुरुआत में इसे भारतीय दंड संहिता की अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण धाराओं के तहत दर्ज किया गया, जैसे समूहों के बीच वैमनस्य पैदा करना और धार्मिक भावना को आहत करना, आदि. फिर कोई कारण ज़ाहिर हुए बग़ैर ही, वही साधारण-सी शिक़ायत आपराधिक साज़िश और UAPA के तहत संगीन अपराधों के आरोप लगाने की बुनियाद बना दी गई. उसी साल नवम्बर में दाखिल चार्जशीट में पुलिस ने राष्ट्रद्रोह और राज्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ने जैसे आरोप भी जोड़ दिए. इतने गंभीर आरोप लगाए जाने के बाद यह और भी ज़रूरी था कि अधिकारी ठोस तरीक़े से यह दिखाते कि शिक़ायत में दर्ज तथ्य, भीमा कोरेगांव में हुए हिंसक दंगे और एल्गार परिषद के कार्यक्रम के बीच कोई सुस्पष्ट कारण-कार्य संबंध है. लेकिन आयोग के सामने गवाही देने वाले अधिकारी हर क़दम पर ऐसा कोई संबंध बताने में नाकाम रहे. 

इसके बजाय, पवार ने अपनी यह राय दर्ज की कि यदि वे किसी भी प्रत्यक्षदर्शी की पहचान करने के लिए कोई क़दम उठाते, तो यह एल्गार परिषद मामले की पूरी अभियोजन प्रक्रिया के लिए घातक सिद्ध हो जाता. वर्तमान में मामले का अभियोजन एनआईए देख रही है. यह बयान इस बात की सीधी स्वीकारोक्ति होना चाहिए था कि एल्गार परिषद और भीमा कोरेगांव के बख़ूबी दर्ज हो चुके हिंसक दंगे के बीच कोई संबंध नहीं है. लेकिन इसके बजाय उनके इस बयान में एक धूर्त क़िस्म की चालाकी छिपी दिखायी देती है. 

असल में, आयोग के सामने रखे गए साक्ष्य यह दिखाते हैं कि भीमा कोरेगांव में हिंदुत्ववादी भीड़ की हिंसा दस्तावेज़ों में दर्ज है और इसकी पुष्टि न सिर्फ़ चश्मदीदों और पीड़ितों के बयानों से, बल्कि अलग-अलग लोगों के निजी मोबाइल फ़ोनों में रिकॉर्ड हुए वीडियो और सरकारी CCTV कैमरों की फ़ुटेज से भी होती है. वहीं दूसरी ओर, बीके 16 के ख़िलाफ़ जिस साज़िश का आरोप लगाया गया है, उसका आधार अनुमान से पैदा हुआ शक़ भी नहीं है. बीके 16 के ख़िलाफ़ लगा साज़िश का आरोप कहीं-कहीं तो महज़ ख़्वामख़्याली से उपजा है, पर उससे भी बुरा यह कि सायास झूठे, बनावटी सबूतों की रोपणी करके यह आरोप गढ़ा गया है. अपराध जैसा तो उनमें से किसी की ओर से कुछ घटा ही नहीं है. ऐसी स्थिति में, आपराधिक कानून के लिहाज से तो जिन लोगों ने झूठे, मनगढ़ंत आरोप लगाए हैं, उल्टे उन पर ही जाँच और मुक़दमा चलाने की ज़रूरत है.

मौजूदा साक्ष्यों को देखा जाये, तो इस मुक़दमे को दर्ज करने वाली राज्य सरकार के पास अब यह दावा करने की कोई ठोस ज़मीन ही नहीं बचती कि एल्गार परिषद की कथित साज़िश का किसी खास हिंसक वारदात से कोई संबंध था.

गोविंद गोपाल महार के वंशज, राजेंद्र गायकवाड़ ने अपने गांव वढु बुद्रुक में एक साईन बोर्ड लगवाया था, जो गाँव में स्थित उनके पूर्वज के स्मारक का रास्ता दिखाता था. 29 दिसंबर 2017 को, यानी भीमा कोरेगांव की हिंसा से थोड़े ही दिन पहले, एक हिंदुत्ववादी भीड़ ने उस बोर्ड को और स्मारक के ऊपर बने छज्जे को नष्ट कर दिया था. फ़ोटो: रितेश उत्तमचंदानी 

भीमा कोरेगांव की हिंसा का असली कारण 

जिन पुलिस अधिकारियों ने गवाही दी, उनमें से एक अधिकारी का बयान अपवाद की तरह सामने आया. इस अधिकारी ने, अनजाने में ही सही, अपनी गवाही में भीड़ की हिंसा के सटीक परिस्थितिजन्य कारण को उजागर कर दिया. यह गवाह है, उस समय के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक संजय पखाले, जिन्होंने वास्तव में पुणे ग्रामीण क्षेत्र में क़ानून-व्यवस्था के प्रबंध की निगरानी की थी. यह वही इलाक़ा था जहाँ 1 जनवरी 2018 को भीड़ ने हिंसा शुरू कर दी और वहीं से वह फैल गई. संजय पखाले ने कहा है कि, “29 दिसंबर को फ़्लेक्स बोर्ड हटाए जाने और उसके बाद ‘अत्याचार अधिनियम’ के अंतर्गत केस दर्ज हो जाने पर सामाजिक सौहार्द बिगड़ गया.”

पखाले जिस घटना का ज़िक्र कर रहे थे, वह वढु बुद्रुक गाँव में भीमा कोरेगांव की हिंसा के तीन दिन पहले हुई थी. घटनाओं के क्रम की पिछली कड़ियों की छानबीन से पता चलता है कि हिंसा की शुरुआत गाँव के नव-बौद्ध हिस्से में लगे एक साइन बोर्ड को लेकर हुई कट्टर दक्षिणपंथी प्रतिक्रिया से हुई. यह बोर्ड गोविंद गोपाल महार के स्मारक की ओर जाने का रास्ता बताता था. पूर्व में महार कहलाने वाले लोग अब अपने आपको हिंदू की जगह नव-बौद्ध कहलाना पसंद करते हैं. वे अपने इतिहास को लेकर बेहद मुखर और सजग रहते हैं. 

यह बोर्ड दलित निवासियों ने 28 दिसंबर की शाम को लगाया था. अगले ही दिन, सुबह 9 बजे उसी गाँव की ऊँची जातियों की भीड़ ने उस साइन बोर्ड को नष्ट कर डाला, जिसे गोविन्द महार के वंशज, उद्यमी राजेन्द्र गायकवाड़ ने लगवाया था. दो अम्बेडकरवादी स्वयंसेवकों ने साइनबोर्ड को शहर से गाँव लाने में गायकवाड़ की मदद की थी. इसके लिए ज़िम्मेदार इन तीनों व्यक्तियों में से कोई भी किसी ऐसी साज़िश का हिस्सेदार नहीं पाया गया है जो वढु बुद्रुक में शुरू हुई हिंसा को दो दिन बाद आयोजित एल्गार परिषद के केस से जोड़ती हो. 

आयोग के सामने रखे गए प्रभावशाली दस्तावेज़ों में से एक, वह ऐतिहासिक पुस्तक है, जिसे 1967 में महाराष्ट्र के प्रसिद्ध तर्कवादी प्रबोधनकार केशव ठाकरे ने प्रकाशित किया था. वे शिवसेना के संस्थापक दिवंगत बाल ठाकरे के पिता थे. किताब का नाम था – ‘शिवकालातिल शूरवीर महार योद्धे’ यानि ‘शिवाजी के काल के शूरवीर महार योद्धा.’ इस किताब में पूर्व-पेशवा मराठा काल के दो महार योद्धाओं गोविन्द गोपाल महार और रायनाक महार का जीवन परिचय है. यहाँ एक सशक्त विवरण मिलता है, जो यह बताता है कि मूल मराठा राजा शिवाजी और उनके पुत्र संभाजी जातिगत भेदभाव को मान्यता देना अनुचित मानते थे, खासकर राज्यसत्ता से जुड़े मामलों में, जिनमें सेना भी शामिल थी. 

इस पुस्तक में स्पष्ट तौर पर बताया गया है कि गोविंद गोपाल महार दरअसल संभाजी के सबसे भरोसेमंद सेनापतियों में से एक थे. इसमें यह भी लिखा है कि 1689 में, जब मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब ने संभाजी को पकड़कर उनकी हत्या कर दी, तो संभाजी की पत्नी येशुबाई के आदेश पर चले व्यापक खोज अभियान के दौरान गोपाल महार को संयोगवश भीमा नदी के किनारे राजा के मृत शरीर के अवशेष मिले. उन्हें इस बात की जानकारी भीमा नदी के तट पर कपड़े धो रही एक विधवा ने दी थी. वे जहाँ पर कपड़े धो रही थीं, उसके सामने नदी के उस किनारे पर वढु बुद्रुक के ठीक नीचे, किसी मृत शरीर के अंग फेंके हुए थे. एक अल्प ज्ञात लेखक, जिसकी पुस्तक ठाकरे ने प्रकाशित की थी, लिखता है कि कैसे गोपाल महार ने अपने कुछ भरोसेमंद साथियों को जुटा कर और आस-पास डेरा डाले मुग़ल सैनिकों के बड़े ख़तरे के बीच, राजा का अंतिम संस्कार गुप्त रूप से वढु बुद्रुक गाँव में कराया.

इत्तेफ़ाक़न, संभाजी के विश्वसनीय सेनापति गोपाल महार के जिन साथियों का ज़िक्र किताब में किया गया है, उनके उपनाम वही बताए गए हैं जो वढु बुद्रुक गाँव की ऊँची जाति के मराठाओं के उपनाम हैं. इससे पता चलता है कि उस वक़्त दलित महारों और ऊँची जाति के मराठों के बीच आपसी सहयोग ठीक-ठाक था. ठीक वही जगह अब जातिगत संघर्ष की जड़ बनी हुई है. इस छोटे से साक्ष्य से विद्वानों के उस अनुसंधान को बल मिलता है, जिससे महाराष्ट्र के फुले-आंबेडकरवादी अपने इन विचारों को ऐतिहासिक मान्यता का दर्जा दिला पाते हैं कि जातियों के बीच विभाजन पहले उतना गहरा और व्यापक नहीं था, जितना संभाजी की मृत्यु के बाद पेशवा काल में हुआ.

साईन बोर्ड जिस पुराने महार स्मारक को इंगित कर रहा था, वह गायकवाड़ के गाँव के घर के बाजू में स्थित था. इस साईन बोर्ड पर 1689 की घटनाओं का संक्षित विवरण भी लिखा हुआ था, कि कैसे सिर क़लम किए गए मराठा राजा का सम्मानजनक अंतिम संस्कार वहाँ से बस कुछ ही क़दम दूर किया गया. यह महार स्मारक गाँव में कब बनाया गया, यह बता पाना मुश्किल है. लेकिन वह किसी भी तरह से नया निर्माण तो बिल्कुल नहीं है, जिससे कि दिसंबर 2017 में गाँव के उच्च जाति के लोग अचानक इससे नाराज़ हो उठते. 

उपलब्ध साक्ष्यों के अनुसार 2015 में हटाये गए एक बड़े बोर्ड की जगह यह नया साइन बोर्ड लगाया गया था. उस साल वढु बुद्रुक में दो प्रमुख गुम्बद-नुमा स्मारकों का प्रबंधन एकतरफ़ा तरीक़े से एक निजी ट्रस्ट ने हस्तगत कर लिया था, जिसकी बागडोर ‘समस्त हिन्दू अघाड़ी’ के प्रमुख एकबोटे के हाथ में थी. इनमें से एक मराठा राजा संभाजी की समाधि थी और दूसरा उनके प्रसिद्ध मित्र कवि कलश की समाधि. 

मौजूद विश्वसनीय दस्तावेज़ों, जैसे एक आवेदन और राजस्व अधिकारियों के साथ किये गए पत्राचार, से पता चलता है कि पहले वाले बोर्ड (जो 2015 में हटाया गया था) पर यह बात लिखी थी कि संभाजी के अंतिम संस्कार करने वालों में गोविंद गोपाल महार के साथ-साथ उस समय के कुछ मराठा निवासी भी शामिल थे, जिनके उपनाम शिवाले-देशमुख और अरगाड़े थे. यानी पुराने बोर्ड में संभाजी के दाह संस्कार में दलित महार और मराठा, दोनों समुदायों की भागीदारी का उल्लेख था. आज संभाजी की समाधि पर जो बोर्ड लगा है, उसे एकबोटे और उनके स्थानीय समर्थकों द्वारा चलाये जा रहे ट्रस्ट ने लगाया है. इस बोर्ड पर सिर्फ़ शिवाले-देशमुख और अरगाड़े के नाम हैं. इसलिए गोविंद महार के नाम वाला एक अलग बोर्ड लगाना तर्कसंगत और ज़रूरी लगता है.

29 दिसंबर को, जिस दिन वढु बुद्रुक में हिंसा हुई, मिलिंद एकबोटे ने ‘समस्त हिंदू आघाड़ी’ के लेटरहेड पर पुणे ज़िला कलेक्टर को एक चिट्ठी लिखी. इस चिट्ठी में उन्होंने भीमा-कोरेगांव की सालगिरह मनाने का विरोध किया और दावा किया कि “इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेशवाओं की गौरवशाली परंपरा को अपमानित किया जा रहा है.” फोटो : निखिल घोरपड़े 

सबूत इतने स्पष्ट हैं कि न सिर्फ़ वढु बुद्रुक में, बल्कि कोरेगांव और सणसवाड़ी जैसे आसपास के गाँवों में भी मिलिंद एकबोटे, उनके संगठन और उनके गुर्गों की भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. आयोग को पेश किये गये बयानात से इन लोगों ने विवाद को भड़काने में और 2015 में लगे असली बोर्ड को हटवाने में जो भूमिका निभाई है, उसकी तफ़सील पता चल जाती है. इन गाँवों में अक्सर आने-जाने वाले और वहाँ प्रभाव रखने वाले संभाजी भिड़े की भूमिका भी इससे बहुत अलग नहीं मालूम होती.

29 दिसंबर को हिंसक भीड़ साइनबोर्ड तक ही नहीं रुकी, बल्कि आगे जाकर उन्होंने महार स्मारक की पवित्रता भी भंग कर दी और उस पर लगी छतरी को नष्ट कर दिया. बाद में पुलिस के हस्तक्षेप के बाद छतरी फिर से बनायी जा सकी. रेकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, जिससे कहीं से भी यह शक़ पैदा हो कि गाँव में किसी नव-बौद्ध की कोई अनावश्यक उकसावा पैदा करने की नीयत रही हो. हर साल की तरह 1 जनवरी को लोग कोरेगांव की जंग के शहीदों को श्रद्धांजलि देने से पहले या बाद में महार स्मारक पर भी आते. यही अपने आप में उस कम जाने जाने वाले महार स्मारक तक पहुँचने का रास्ता दिखाने वाला नया साइनबोर्ड लगाने के लिए पर्याप्त कारण था.

लेकिन वढु बुद्रुक में हुई हिंसा इस बात का निरपवाद उदाहरण है कि ऊँची जाति के मराठों का ब्राह्मणवादी हिस्सा दलितों की किसी भी तरह की अपनी इच्छा या पहचान को जताने के अधिकार को बर्दाश्त नहीं करता. वे यह बात भी बर्दाश्त नहीं कर सके कि नव-बौद्धों के किसी पूर्वज ने मराठा राजा संभाजी के शव को उठाया और अंतिम संस्कार करवाया, चाहे इसमें मराठों की मदद मिली हो या न मिली हो. ज़्यादातर मराठों को न सिर्फ़ तोड़ा-मरोड़ा इतिहास, बल्कि ब्राह्मणवादी हिंदुत्व के पुरोधाओं के इशारे पर पूरी तरह विकृत एक ऐसे नज़रिये पर विश्वास करा दिया गया है जिसमें यह मान लिया जाता है कि जाति की सारी दीवारें बिल्कुल प्राचीन, यहाँ तक कि प्रागैतिहासिक ज़माने से चली आ रही हैं, एक ऐसा यथार्थ जो सवालों से परे हो. 

इस विषय पर एक प्रामाणिक पुस्तक है, जो आयोग के रिकॉर्ड में शामिल नहीं है. यह वही विद्वानों का अनुसंधान है जिसका पहले उल्लेख किया जा चुका है. ‘Caste, Society and Politics in India from the Eighteenth Century to the Modern Age,’ इस नाम से प्रकाशित पुस्तक में इसके निषर्ष उपलब्ध हैं. लेखक हैं सुज़न बेली, जो केम्ब्रिज विश्वविद्यालय में ऐतिहासिक मानवविज्ञान की मानद प्रोफेसर हैं. बेली के अनुसार 17वीं सदी में शिवाजी और उनके पुत्र संभाजी के नेतृत्व वाले मावलों के मराठा शासन की तुलना में, 1700–1830 के “ब्राह्मण राज” में जातिगत पदानुक्रम अधिक जड़ हो गए थे, खासकर महाराष्ट्र के उन हिस्सों में जो पेशवा शासन के अधीन थे. विद्वतापूर्ण यह पुस्तक 1960 के दशक के उस मौखिक इतिहास के संकलन से मेल खाती है, जो प्रबोधनकार केशव ठाकरे ने प्रकाशित किया था, जबकि उनके पुत्र की शिवसेना अभी अस्तित्व में भी नहीं आई थी.

सवर्ण हिंदुत्ववादी पूर्वाग्रहों को आयोग के सामने संदर्भ सहित पेश किया गया. आयोग को सौंपे गये मराठी ऐतिहासिक साहित्य में इन बातों में से कुछ का विस्तार से उल्लेख किया गया है. इसमें मराठी मौखिक इतिहास-लेखन की और भी पुरानी परंपरा से निकला हुआ वो ब्यौरा भी शामिल है, जिसकी कुछ हद तक पुष्टि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विश्वसनीय माने जाने वाले इतिहासकार वी.एस. बेंद्रे भी वढु बुद्रुक में तीन समाधियों की अपनी पुरातात्विक खोज के बारे में लिखते हुए कर जाते हैं. इससे यह बात समझ में आती है कि कैसे संभाजी का मुग़लों के हत्थे चढ़ जाना भी शिवाजी और संभाजी के प्रति कथित ब्राह्मणवादी दुराग्रहों की भूमिका थी, और कैसे कुछ ब्राह्मण तो शिवाजी और संभाजी दोनों को ही शूद्र मानते थे; संभाजी जो वेद मंत्रों का धाराप्रवाह पाठ कर लेते थे उस पर भी उन्हें एतराज़ होता था.

रेकॉर्ड में मौजूद साहित्य के अनुसार इन्हीं ब्राह्मणों ने अंततः औरंगज़ेब से साठगांठ करके संभाजी को संगमेश्वर (रत्नागिरी) में पकड़वाने में मदद की. फलस्वरूप संभाजी की हत्या कर उनके शरीर के टुकड़ों को तुलापुर के आसपास फेंक दिया गया, जो वढु बुद्रुक के सामने नदी के उस पार स्थित है. इसके बाद संभाजी के बाद के दौर में, पेशवाओं की सत्ता हथियाने की कुचालों के क्रम में संभाजी और येशुबाई के पुत्र शाहू प्रथम ने तत्कालीन पेशवा बाजीराव प्रथम को बाक़ायदा सिंहासन सौंप दिया.

मिलिंद एकबोटे और संभाजी भिड़े (बीच में) हमेशा से ही भीमा कोरेगांव के जुटान को गद्दारों की गतिविधि मानते रहे हैं, क्योंकि वे दोनों पेशवाओं का गौरवगान करते हैं, जबकि भीमा कोरेगांव की वार्षिक स्मरण-सभा में पेशवाओं की निंदा की जाती है और उन्हें दोषी ठहराया जाता है. फोटो: निखिल घोरपड़े

वढु बुद्रुक की भीड़ ने भीमा कोरेगांव पर कैसे हमला किया

29 दिसंबर 2017 को वढु बुद्रुक में हुए घटनाक्रम पर अब वापस लौटते हैं. साईन बोर्ड हटाए जाने और गोविंद गोपाल स्मारक की पवित्रता भंग किए जाने के चलते सुषमा ओव्हाल नाम की एक दलित ग्रामीण ने देर शाम शिक्रापुर पुलिस स्टेशन में हिंसा की रिपोर्ट दर्ज कराई. ओव्हाल ने अपनी इस शिक़ायत में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत गाँव के 49 लोगों के नाम दर्ज कराए. इसमें एकबोटे पर वढु बुद्रुक में आकर ऊँची जाति के लोगों को भड़काने का आरोप दर्ज है.

इसके बाद घटनाएँ एक के बाद एक सामने आती गईं, जैसा कि चार पुलिस अधिकारियों ने आयोग को बताया. इस संबंध में अधिकारियों के बयानात कहीं-कहीं ज़रा-ज़रा सी किंतु उल्लेखनीय विसंगतियों को छोड़, क़ाफ़ी विश्वसनीय हैं. ये अधिकारी थे – आईपीएस अधिकारी संजय पखाले, पूर्व पुणे ग्रामीण पुलिस अधीक्षक सुवेज़ हक़, उप अधीक्षक गणेश मोरे और वरिष्ठ निरीक्षक रमेश गलांडे. उसी दिन शिक्रापुर थाने में एक दूसरे के खिलाफ़ कई तरह के मामले दर्ज हुए थे. अगले दिन ओव्हाल की एफआईआर में नामित सात लोगों को क़ानूनी बाध्यता के चलते गिरफ़्तार कर लिया गया. इसके बाद गाँव में दोनों समुदायों के बीच एक शांति समझौते पर हस्ताक्षर किये गये. लेकिन यह समझौता 1 जनवरी 2018 को कहीं अधिक बड़े पैमाने पर होने वाली घटनाओं के लिए सिर्फ़ एक झीना आवरण साबित हुआ. ऊँची जातियों की जातिगत पूर्वाग्रह भरी सोच वढु बुद्रुक के आसपास के गाँवों भीमा कोरेगांव से लेकर सणसवाड़ी तक फैल गई. ऊँची जाति के लोगों ने 1 जनवरी को “काला दिवस” मनाने का फ़ैसला किया, जिसका उद्देश्य भीमा कोरेगांव और वढु बुद्रुक के तीन स्मारकों पर पहुँचने वाले लाखों दलित-बहुजनों को भोजन, पानी और शौचालय जैसी सभी सुविधाओं से वंचित कर देना था.

30 दिसंबर की देर शाम से लेकर 1 जनवरी की सुबह तक भिड़े, एकबोटे और उनके गुर्गों द्वारा चलाये जा रहे अनेकों हिंदुत्व संगठनों के साथ जुड़े स्थानीय मराठा लोगों ने कम से कम छः भड़काऊ सोशल मीडिया पोस्ट फैलाये, जिनका उद्देश्य हिंसा भड़काना था. व्यापक रूप से प्रचारित सोशल मीडिया पोस्ट भीमा कोरेगांव में होने वाले कार्यक्रम के प्रति विरोध को निरंतर बढ़ाते गये, जैसा कि अपनी जिरह में पखाले ने माना. 

उधर पुलिस अधिकारियों ने जनवरी से पहले उमड़ रहे इस तूफ़ान के संकेतों के बारे में जानकर भी अनजान बने रहने का दिखावा किया. उन्होंने वे सारे ज़रूरी क़दम उठाये जाने का दावा किया कि ऊँची जातियों के जातिगत पूर्वाग्रह वाले लोग जिन आक्रामक भावनाओं को चुपचाप हवा दे रहे थे उनका किसी भी तरह का विस्फोट होने से रोका जा सके. पुलिस के अनुसार उन्होंने दो संवेदनशील स्थानों को चिह्नित कर पर्याप्त एहतियाती उपाय कर लिये थे – वढु बुद्रुक के स्मारक और पेरणे फाटा, जहाँ भीमा कोरेगांव का ऊँचा शहीद स्तंभ स्थित है. 

लेकिन इसके बावजूद अधिक विश्वसनीय सीसीटीवी रिकॉर्डिंग की जगह पुलिस द्वारा प्रस्तुत किये गये संपादित वीडियो क्लिप भी यह दिखाते हैं कि वहाँ ऊँची जाति की आक्रामक भीड़ को एकत्रित होने दिया गया. गलांडे और मोरे जैसे अधिकारियों ने हालांकि महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने के लिए बहुत कोशिशें कीं, फिर भी उन्होंने आक्रामक सवर्णों की भीड़ का अनुमान बड़ा – एक हज़ार बताया है. 1 जनवरी की सुबह लगभग 9 बजे वढु बुद्रुक में स्थित संभाजी स्मारक पर भगवा झंडे लिये, प्रेरणा मंत्र का उग्र, सांप्रदायिक जाप करते हुए भीड़ इकट्ठा हुई. इस भगवा टोली ने एक साथ, मालूम होता है, पूरे साढ़े तीन किलोमीटर तक मार्च किया. कुछ पैदल चल रहे थे, तो कुछ मोटर साइकिलों पर सवार. हाथों में अनगिनत झंडे लिये वे पूरे रास्ते में जातिवादी नारे लगाते हुए हुल्लड़ मचा रहे थे.

आसपास खड़े दलित लोग स्पष्ट तौर पर क्षुब्ध दिखाई दे रहे थे कि उनके उत्सव के दिन हिंदुत्व की दखल हो रही है. तभी वह चिंगारी भड़क उठी, जिसकी आशंका पहले से थी. एक अकेला युवक (जिसकी पहचान अभी तक नहीं हो पाई है) बड़े-से डंडे पर नीला झंडा लिये कोरेगांव-भीमा गाँव के वढु चौक के पास खड़ा हुआ भगवा झंडे लेकर चल रही भीड़ के सामने बिना सोचे-समझे अपना झंडा लहराने लगा. यह उसकी दोस्ताना भाव-भंगिमा थी, दुश्मनी थी या नासमझी, या फिर किसी ने चालाकी से उसे उकसाया था, यह कहना मुश्किल है. इस वाक़िये का उपलब्ध सबूत सिर्फ़ वे वीडियो क्लिप ही हैं जो राहगीरों और अन्य हमलों के पीड़ितों ने बनाये थे.

कुछ ही पलों में भगवा झंडे लिये चल रही उग्र भीड़ ने उस युवक को चारों ओर से घेर लिया और बेरहमी से उसकी पिटाई कर दी. इस घटना ने बाद में घटित होने वाली अंधाधुंध हिंसा की भूमिका तैयार कर दी. इस पूर्व नियोजित आक्रामक कार्रवाई के दौरान हिंदुत्व की भीड़ को डंडों और लोहे की रॉड से लोगों पर हमला करते देखा गया. छतों से पत्थर फेंके गये, जिसके लिए पत्थर निश्चित रूप से पहले से ही जमा किये गये होंगे. पेट्रोल से भरी हुई बोतलों और कैन का इस्तेमाल करके जगह-जगह आग लगायी गयी. वढु चौक से हिंसा कालांतर में चारों दिशाओं में फैलने लगी. पूर्व की ओर, जहाँ सड़क अहमदनगर हाईवे की तरफ़ जाती है; और पश्चिम की ओर, जहाँ भीमा नदी के पुल पर दलित युवाओं ने इसका मुक़ाबला किया, जो पुल शहीद स्मारक पर श्रद्धांजलि देने जाने वालों या वहाँ से आने वालों से पटा हुआ था.

 

फोटो: निखिल घोरपड़े 

भीमा कोरेगांव में भीड़ की हिंसा भड़क जाने पर वहाँ तैनात पुलिस कर्मी ना तो उतनी फुर्ती से काम कर पाये और न ही इस संभावना के प्रति पर्याप्त सतर्क थे. उन्होंने झगड़ते गुटों को क़ाबू में करने का प्रयास करने में बहुत देर कर दी. तुरंत अतिरिक्त पुलिस बल बुलाया गया, लेकिन रास्ते में ट्रैफ़िक जाम के कारण वह बहुत देर से पहुँचा. भीड़ की हिंसा देर शाम तक जारी रही. हजारों दलित इस बीच भागने की कोशिश करते रहे, जबकि कइयों के यातायात के साधन पूरी तरह से नष्ट हो चुके या आग के हवाले कर दिये गये थे. एक मराठा युवक राहुल फटांगले पर सणसवाडी में कुछ अज्ञात व्यक्तियों ने हमला कर दिया. उसे पुलिस टीम अस्पताल ले गयी, जहाँ घायल अवस्था में उसने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया. कुछ पीड़ितों ने आयोग को अपने बयानों में बताया कि क़ानून-व्यवस्था के लिए ज़िम्मेदार प्रशासनिक तंत्र की ओर से की गयी असामान्य देरी, जानकारी के आदान-प्रदान में तालमेल की कमी और किसी अप्रिय घटना को रोकने की स्पष्ट अनिच्छा के मंज़र में हिंसा, डर और आतंक देर रात तक जारी रहा. 

कुछ प्रत्यक्षदर्शियों की बातों से ज़ाहिर हुआ कि पुलिस ने लोगों को कठिन परिस्थितियों से निकलने में कहीं-कहीं सहायता भी की. लेकिन इस बात के सुबूत भी सामने आये कि ख़ास तौर पर शिक़ायत दर्ज करने, बयानों को रेकॉर्ड करने, और आम तौर पर क़ानूनी बाध्यता की अनदेखी कर, एफ़आईआर दर्ज हो जाने पर जाँच करने में लापरवाही और टालमटोल की गयी. ऐसा भी लगता है कि हिंसा को अंजाम देने वाले गिरफ़्तार लोगों को पुलिस के सायास टालमटोल से लाभ मिला होगा, क्योंकि पुलिस ने प्रभावी क़ानूनी कार्यवाई को अपने अंजाम तक पहुँचाने में जानबूझकर ढील दी.  

आयोग के सामने मौजूद साक्ष्य इस बात की प्रबल सम्भावना की ओर संकेत करते हैं कि भीड़ की हिंसा पहले से ही सोची-समझी और सुनियोजित तरीक़े से अंजाम दी गयी थी. इसमें मिलिंद एकबोटे की वढु बुद्रुक और भीमा कोरेगांव में की गई गतिविधियों; भीड़ के कुछ लोग उनके संगठन से जुड़े हुए होने; दोनों गाँवों की पंचायतों पर उनके नियंत्रण; और हिंसक मोड़ तक पहुँचाने वाली घटनाओं में उनकी सक्रिय भागीदारी के सबूत शामिल हैं. इस बात के स्पष्ट संकेत हैं कि 1 जनवरी 2018 के कार्यक्रम से पहले वैमस्यपूर्ण हिंदुत्व-पक्षी सोशल मीडिया पोस्ट फैलाने के ज़रिए भी साज़िश रची गई थी.

इस बात के भी साक्ष्य हैं कि स्मरण-समारोह के अवसर पर “काला दिवस” का आह्वान कर, आने वाले दलित-बहुजनों को सामाजिक बहिष्कार झेलने को मजबूर करने के लिए कुछ गाँवों की पंचायतों के नियम-पद्धतियों का उल्लंघन कर, दिखावे के तौर पर चालाकी से अपने हित में इस्तेमाल कर, गुप्त तरीक़े से “बंद” के प्रस्ताव पारित किये गये. इस बहिष्कार के ज़रिए से आने वाले लोगों को भोजन, चाय-नाश्ता-पानी, शौचालय और अस्थायी आश्रय जैसी बुनियादी आवश्यकताओं से इरादतन वंचित कर दिया गया. इतना ही नहीं, जिन स्थानीय दलितों ने इस “बंद” की अवहेलना कर, हर साल की तरह, समारोह के अवसर पर आने वालों को यही सुविधाएँ मुहैय्या कराने का साहस किया, उन पर प्रतिशोध-स्वरूपी हमले किये गये, यहाँ तक कि उनके घर और व्यवसाय भी आगजनी से और तोड़-फोड़कर गिरा दिये गये.

साक्ष्य यह भी बताते हैं कि भीड़ के हिंसक वारदात हो जाने पर सरकारी कार्यवाही इतनी धीमी और अधूरी थी कि यह शक़ पैदा होता है कि प्रभावशाली और अपेक्षाकृत संपन्न ऊँची जाति के धुर-दक्षिणपंथी समूहों के साथ निचले स्तर के अधिकारियों-कर्मचारियों की मिलीभगत थी. आम नागरिकों या पुलिसकर्मियों को आयी चोटों की बात करें या फिर मोटर साइकिलों, कारों और बसों को आग की भेंट चढ़ा देने समेत संपत्ति की व्यापक तबाही की, कुल मिलाकर नुकसान ज़्यादातर उन्हीं पुरुषों, महिलाओं, बच्चों और वरिष्ठ नागरिकों को भुगतना पड़ा जो कोरेगांव के शहीद स्मारक पर श्रद्धांजलि देने आये थे. अगर उचित राजकीय या पुलिस हस्तक्षेप हुआ होता, तो राह-किनारे स्थित स्थानीय दलितों की दुकानों और घरों में की गई तोड़फोड़ और प्रतिक्रिया में उनकी ओर से हुई छिट-पुट कार्रवाइयों को रोका जा सकता था.

हिंसा की शुरुआत और उसके प्रसार के पैटर्न से यह पता चलता है कि भीमा कोरेगांव और उसके आसपास के कुछ ख़ास व्यक्तियों की इसमें संलिप्तता थी. भीमा कोरेगांव समारोह से चंद दिन पहले एकबोटे ने शहीद स्मारक के पास स्थित होटल सोनाई में एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर स्मरण समारोह के प्रति अपने विरोध का ऐलान किया था. इसके बाद उसने पत्रकारों में अपने पर्चे वितरित किये, जो कि आयोग के रेकॉर्ड में शामिल होने के कारण निर्विवाद रूप से उसकी संस्था की विरोधी भूमिका साबित होती है. पीछे पलट कर देखें, तो सार के तौर पर यह निष्कर्ष निकलता है कि एकबोटे और भिड़े जैसे कुछ प्रमुख व्यक्तियों को एहतियातन हिरासत में ले लिया जाता, तो हिंसा को टाला जा सकता था. और तो और, हिंदुत्ववादियों की भीड़ ने उस दिन जिस विध्वंसक सामग्री का इस्तेमाल किया, उसकी शायद बरामदगी भी संभव हो जाती. दूसरी ओर, इस प्रशासनिक विफलता के चलते अल्प-सुरक्षित अंबेडकरवादियों को हिन्दुत्ववादी हमलों के ख़तरों से अपने नीले झंडे और नव-बौद्ध पंचशील ध्वज छिपा-छिपाकर चलने-दौड़ने को मजबूर होना पड़ा, जो कि उनकी सामाजिक पहचान और राजनीतिक संबद्धता के प्रतीक हैं.

लेकिन उस दिन झंडे तो बहुत सारे जला दिये गये. इस महा-छलावे पर तुर्रा यह कि पुणे पुलिस ने “माओवादी साज़िश” का मिथक खड़ा करने के लिए एक नामुराद निजी शिक़ायत के आधार पर केस दर्ज कर दी और उसमें हवा भर-भर कर गुब्बारे की शक्ल में फैला भी दिया. चाहे जो हो, आयोग के साक्ष्यों से यह साफ़ ज़ाहिर होता है कि जातिगत पूर्वाग्रहों से ग्रस्त, संविधान-विरोधी हिंदुत्ववादी साज़िशों के चलते भीमा कोरगांव में हुई भीड़ की हिंसा और संवैधानिक लोकतंत्र के प्रति समर्थन का यक़ीन दिलाते हुए आयोजित हुई जाति-विरोधी एल्गार परिषद के बीच कोई कार्य-कारण संबंध नहीं था. 

This article was originally published in English on February 27, 2025.

 

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Prashant Rahi is an electrical and systems engineer, who completed his education from IIT, BHU, before eventually becoming a journalist for about a decade in Uttar Pradesh and Uttarakhand. He was the Chairperson for Human Rights and Democracy at the annual Indian Social Science Congresses held between 2011 and 2013, contributing to the theorisation of social activists’ and researchers’ experiences. Rahi devoted the greater part of his time and energy for revolutionary democratic changes as a grassroots activist with various collectives. For seven years, he worked as a Correspondent for The Statesman, chronicling the Uttarakhand statehood movement, while also participating in it. He has also contributed political articles for Hindi periodicals including Blitz, Itihasbodh, Samkaleen Teesri Duniya, Samayantar and Samkaleem Hastakshep. From his first arrest in 2007 December in a fake case, where he was charged as the key organiser of an imagined Maoist training camp in a forest area of Uttarakhand, to his release in March 2024 in the well-known GN Saibaba case, Rahi has been hounded as a prominent Maoist by the state for all of 17 years. In 2024, he joined The Polis Project as a roving reporter, focusing on social movements.


Mouli Sharma is a scholar of religion at Jamia Millia Islamia and a freelance journalist from New Delhi. Her work has appeared in Nivarana, Think Global Health, Feminism in India, The Leaflet, and NewsClick. She is a published photojournalist & illustrator and has been featured in The Hindu College Gazette and the quarterly Pink Disco. She is the editor-in-chief of the student-run news site, The Voice Express, and is a literary editor for the digital lit-mag, The Queer Gaze.

भीमा कोरेगांव हिंसा की असली जड़ कोई एल्गार साजिश नहीं, सवर्ण हिंदुत्व दबदबा है

By , February 4, 2026
PHOTO BY NIKHIL GHORPADE

यह एल्गार परिषद/भीमा कोरेगांव मामले पर तीन हिस्सों वाली अनुसंधान सीरीज़ की पहली रिपोर्ट का हिंदी अनुवाद है। यह रिपोर्ट मूल रूप से फरवरी 2025 में अंग्रेजी में प्रकाशित हुई थी। अनुवाद में आने वाले अगले हिस्सों के लिए द पोलिस प्रोजेक्ट को सब्सक्राइब करें।
अंग्रेज़ी से अनुवाद: मनीष आज़ाद 

“कुल्हाड़ी को अभी मेरी आदत नहीं
उसका घाव देह में मेरी उतना गहरा नहीं

आम जन का येलगार उठ रहा है
ये कोई श्रेष्ठ केंचुओं का भोंदू जमाव नहीं “

एक मराठी ग़ज़ल के ये दो शेर कुछ लोगों को ज़रा तीखे लग सकते हैं. लेकिन शोषित-पीड़ित लोगों के भीतर ये आक्रोश की तीखी लहर छेड़ पाते हैं. पहला शेर इस ग़ज़ल का मुखड़ा है और दूसरे शेर में जो आह्वान है, वही इसे नाम देता है – येल्गार; मराठी में एलगार. इस ग़ज़ल के रचयिता महाराष्ट्र के अमरावती में ब्राह्मण परिवार में जन्मे एक कवि सुरेश भट हैं. उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया था. आज नागपुर में उनके नाम का एक प्रतिष्ठित सभागार है – कविवर सुरेश भट सभागृह. इस सभागार का उदघाटन सितंबर 2017 में उस समय के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने किया था. ब्राह्मणवादी धुर दक्षिणपंथी मुख्यालय के बेहद क़रीब स्थित है यह.  

उस साल के अंतिम दिन, विवादास्पद ‘एल्गार परिषद’ ने भारत में लोकतंत्र की रक्षा के लिए एक सार्वजनिक सभा आयोजित की थी. आयोजन पुणे शहर के बिल्कुल बीच में पेशवाओं की राजधानी शनिवारवाड़ा की भव्य प्राचीन ईमारत में किया गया. अगले ही दिन, पुणे के प्रशासनिक क्षेत्र से बाहर, शहर से लगभग तीस किलोमीटर पूर्व दिशा की ओर, भीमा नदी के किनारे बसे एक विकसित गाँव कोरेगांव में हिंसा भड़क उठी. भीमा कोरेगांव लंबे समय से सर्वाधिक उत्पीड़ित जातियों और फुले–अंबेडकरवादी विचारधारा के वाहकों के लिए एक पवित्र, राज्य-प्रायोजित स्मृति-स्थल रहा है.

200 साल पुराने विवादित कथानक की उत्पत्ति की खोज 

वह ईस्ट इंडिया कंपनी की एक छोटी बटालियन थी जिसमें करीब 800 सैनिक थे. इस टुकड़ी में  ज़्यादातर दलित-बहुजन शोषित समुदायों से आने वाले लोग शामिल थे, जिनमें सबसे बड़ी संख्या महार जाति की थी. 1 जनवरी 1818 को इस टुकड़ी ने इसी कोरेगांव में 30,000 सैनिकों की विशाल युद्धोन्मत्त सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था. जंग के मैदान में ऊँची जाति के वे ब्राह्मण सेनापती इस विशाल सेना की अगुवाई कर रहे थे. वे उस समय विराजमान, बहुत सारों की घृणा के पात्र पेशवा बाजीराव द्वितीय के वफादार थे. यूँ तो ईस्ट इंडिया कंपनी सबसे भरोसेमंद सहयोगी और उदार संरक्षक थी पेशवाओं की, जो कि शिवाजी और संभाजी भोसले के मराठा शासन के दौरान प्रधानमंत्री होते थे. ऐतिहासिक दृष्टि से कहें, तो पेशवा और अंग्रेज़ों के बीच सामान्यतः बने रहने वाले अनुकूल रिश्तों में आई सामयिक विसंगति अंग्रेज़ों की उपनिवेशवादी सत्ता के निरंतर विस्तार की मुहीम की राह में कोई बड़ी बाधा नहीं थी. दलील यह भी दी जा सकती है कि बाजीराव द्वितीय की ही चालों से उत्पन्न क्रिया-प्रतिक्रिया के फलस्वरूप बरतानवी साम्राज्य ने ‘बॉम्बे प्रेसीडेंसी’ के रूप में अपनी एक संगठित राजनीतिक व्यवस्था की नींव रख दी.

कोरेगांव की जंग, खासकर भारत के उत्तर-औपनिवेशिक काल में, सायास एक दंतकथा के समान प्रसिद्धि हासिल करती गई. इस विजय को केवल सामरिक अर्थ में ही नहीं देखा गया. यानी यह केवल नदी पार के एक गाँव की चौकी की वीरता से रक्षा करने भर में सफलता नहीं थी. यह जीत थी जाति, जेंडर और सम्प्रदाय विशेष के साथ हो रहे उन वीभत्स अन्यायों के ख़िलाफ़ भी, जो शिवाजी-संभाजी के बाद के पेशवाई शासनकाल में लगातार बढ़ते गए थे. पिछले कम से कम चार दशकों से, महाराष्ट्र की अलग-अलग सरकारें हर साल 1 जनवरी को वहाँ शहीद स्मारक पर श्रद्धांजलि देने आने वाली भीड़ के लिए प्रबंध सुनिश्चित करते आये थे. लोग सुबह से देर रात तक बड़ी नियमबद्धता के साथ हर 1 जनवारी को वहाँ जुटते. 2018 में, कोरेगांव की जंग की 200वीं वर्षगाँठ पर भी हमेशा की तरह शांतिपूर्ण भीड़ जुटी. लेकिन इस बार संख्या बढ़कर 5 लाख से भी ज़्यादा थी. 

कोरेगांव की जंग किसी दंतकथा का दर्ज़ा हासिल कर चुकी थी. जंग की याद में कोरेगांव में एक शहीद स्मारक बनाया गया है. यहाँ हर साल 1 जनवरी को हज़ारों लोग श्रद्धांजलि देने आते हैं.
फोटो: निखिल घोरपड़े

लेकिन जो एल्गार परिषद आयोजित हुई, वह हमारे आपराधिक न्याय तंत्र की भूलभुलैया में 2018 के भीमा-कोरेगांव दंगा-फ़साद का पर्याय बन गई. हिंसा के लिए विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ताओं को ज़िम्मेदार ठहराया गया. बाद में उन्हें ‘भीमा-कोरेगांव 16’ या ‘बीके 16’ कहा जाने लगा. उनमें एल्गार परिषद के आयोजक भी थे और वे लोग भी जिनका परिषद से कोई संबंध नहीं था. नामचीन मानवाधिकार कार्यकर्ता अचानक रातों रात आतंकी साज़िश के आरोपी बना दिए गए. अभी हाल में रिहा हुए एल्गार परिषद के प्रमुख आयोजकों में से एक सुधीर ढवले का कहना यही होगा कि एल्गार परिषद का उद्देश्य था – जनता में उस शौर्य का मूल्य संचारित करना, जिसकी मिसाल उस छोटे से वैविध्यपूर्ण दल ने अपने दलित पूर्वजों से मिली शक्ति के बदौलत बाजीराव द्वितीय की विशाल पेशवा सेना के ख़िलाफ़ पेश की थी. 

पेशवा शासन का अधःपतन ऐतिहासिक अभिलेखों से पुष्ट होता है – उसकी सेना के सभी ओहदे सिर्फ़ और सिर्फ़ ब्राह्मण सेनापतियों के हाथ में थे, जबकि सैनिकों की भर्ती दक्षिण के सामंती सरदारों ने मुहैया कराई थी. हमलावरों के तौर पर तबाही मचाने के लिए भाड़े की अरब घुड़सवार टुकड़ी थी. गुज़री पीढ़ियों के मराठी आलोचकों के अनुसार, सेना की शाही शानो-शौकत असल में प्रतिगामी सामाजिक व्यवस्था का ही प्रतिबिंब थी. वहाँ की सबसे बड़ी वंचित जाति महारों को हथियार रखने तक की अनुमति नहीं थी. उन्हें सेना से बाहर रखने का बाक़ायदा फ़रमान था, जो कि शिवाजी और संभाजी के दौर की मावला मराठा फ़ौज से बिल्कुल भिन्न था, जिसमें महारों में से कुछ लोग अधिकारी तक बन सकते थे. पेशवा राज में सामाजिक ऊँच-नीच के नियम बेहद कठोर थे. इस बात का हवाला सावित्रीबाई फुले की किशोरवय छात्रा मुक्‍ता साल्वे (जो एक दूसरी दलित जाति मांग से थीं) के लेखन से मिलता है. वह लिखती हैं कि अगर कोई महार या मांग पुणे में किसी व्यायामशाला के पास से गुज़रने की हिमाक़त करता, तो उसका सिर धड़ से काट कर गेंद बनाकर खेला जाता. राज्य के सैनिक तलवारों को बल्ला बनाकर उसे पहाड़ी ढलान से नीचे लुढ़काते. स्त्रियों के साथ जहाँ खरीदी-बेची जाने वाली वस्तु के समान व्यवहार होता था, वहीं ताकतवरों का व्यभिचार गर्व की बात माना जाता.

दुर्भाग्य से बाजीराव द्वितीय के विचारधारात्मक उत्तराधिकारी, आज की अति-सक्रिय हिंदू राष्ट्रवादी टुकड़ियाँ उसी अतीत के चश्मे से आज के भेद-भाव देखते हैं. कोरेगांव की जंग में बाजीराव द्वितीय की हार के प्रति बेहद भावुक होकर वे अपने पूर्वजों का गौरव खो जाने पर, एक किस्म की सत्यनिष्ठता के साथ, रंज पालते हैं, और अपनी इस ब्राह्मणवादी राष्ट्रवादी बातफ़रोशी को उचित ठहराने के लिए वे 1818 की जंग में विजयी ईस्ट इंडिया कंपनी के उपनिवेशवादी चरित्र को भी अपनी राजनीतिक दलीलों में शामिल करते हैं. मराठा राजा शिवाजी और संभाजी भोसले का वंशीय और सामाजिक सम्बन्ध शूद्रों के अधिक समीप था, जो हिंदू वर्ण व्यवस्था के सामाजिक श्रेणीक्रम में चौथे पायदान पर आते हैं. 1818 की जंग से लगभग सौ साल पहले मराठा साम्राज्य के प्रधान मंत्री (पेशवा) सत्ता में ऊपर उठते-उठते, राजा बन गए थे, और उन्होंने एक नया वंशानुगत शासन स्थापित किया था. बहु-स्तरीय समाज में धर्म द्वारा अनुमोदित सबसे ऊँचे पायदान पर आसीन ये पेशवा उच्च-पदस्थ ब्राह्मण जाति से ही आते थे.

अतः भगवा खेमे के लिए यह विमर्श वैचारिक चारे का काम करता है, जिसके दम पर एक ओर ख़ुद को पीड़ित दिखाने और दूसरी ओर इसी बात का आक्रामक रूप से बदला लेने का बहाना बन जाता है. निशाने पर अक्सर वे लोग होते हैं जो पहले से ही शोषित और हाशिये पर ढकेले हुए हों. ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि ऐसे दबंगई वाले माहौल में, चाहे वह कोरेगांव के आसपास हो या पुणे से सुदूर कोई जगह, संवैधानिक तौर पर अस्पृश्यता का उन्मूलन कर दिए जाने का तथाकथित पूर्व-अछूत जातियों और चौथे पायदान के शूद्रों के लिए असल जीवन में कोई ख़ास असर नहीं पड़ा है. भारतीय संविधान के दायरे में जाति व्यवस्था की कालातीत हो चुकी प्रथाएँ हों या चातुर्वर्ण का धर्मावलंबी सिद्धांत, किसी के भी उन्मूलन की चर्चा आज तक कभी नहीं हुई है. 

इसलिए जब तथाकथित पूर्व-अछूत लोग अपने रोज़मर्रा के जीवन में आकाश का थोड़ा-सा और हिस्सा पाने के लिए संघर्ष कर रहे हों, तो उन्हें पेशवाशाही की ज़रा-सी भी झलक दिख जाने पर वह घृणायोग्य, वीभत्स और नाक़ाबिले बर्दाश्त मालूम होती है. वहीं दूसरी ओर, कविवर सुरेश भट से विपरीत, ऊँची जातियों का ऊपर उठता हुआ असंवेदनशील तबक़ा अक्सर ऐतिहासिक रूप से प्रतिगामी बिंबों-प्रतिमानों के इर्द-गिर्द इकट्ठा हो जाता है. आज की प्रभुत्वशाली विचारधारा की सत्ताओं से बल पाकर हिंदुत्ववादी दक्षिणपंथ ने हाल के वर्षों में पुणे शहर के तेज़ी से विकसित हो रहे सीमांतों पर राजनीतिक वर्ग और सामंती पूँजीपति तबक़ों के साथ अपने गठजोड़ का आकार बढ़ाने के लिए अनुकूल स्थितियाँ पायी हैं. इस परिस्थिति में इतिहास के गहन सवालों और सामाजिक सद्भाव से संबंधित अनसुलझे मसलों की तोड़-मरोड़ करने और उनकी झूठी व्याख्याएँ पेश करने में लाज़िमी तौर पर आसानी थी. 

इस मंज़र में भट की ग़ज़ल इसलिए मायने रखती है, क्योंकि यह भारत के वंचितों के सबसे निचले तबक़ों के उत्थान में अम्बेडकर के योगदान का सम्मान करती है. उनकी ग़ज़ल के “आम जन” के “येलगार” पर आज आरोप है एक अराजक भीड़ की सिलसिलेवार हिंसा की अगुवाई करने का. स्पष्ट है कि यह उन “श्रेष्ठ केंचुओं” के जुर्म को सरेआम माफ़ करने के लिए छोड़ा गया धुआँ ही था, जो उत्पीड़ितों के बीच बढ़ते रोष को सहन नहीं कर पा रहे थे. यहाँ ग़ज़लकार की बात पर ग़ौर करने में ही बुद्धिमानी दिखायी देती है. उस येलगार के जवाब में श्रेष्ठजनों की विध्वंसक प्रतिक्रिया के लिए किसे ज़िम्मेदार ठहराया जाना चाहिए – वंचित लोगों को या संपन्न लोगों को? क्या न्याय की देवी नंगी सच्चाई को भी नहीं देखना चाहती? आँखों पर पट्टी बाँधे तराज़ू को तौलने वाली न्याय की देवी क्या इतनी नीची गिर सकती है कि वह ऐसे किसी प्रशासनिक तंत्र को क्षमा कर दे जिसने उन्मत्त भीड़ के साथ पर्दे की आड़ से गठजोड़ कर लिया हो? 

फ़ोटो : निखिल घोरपड़े 

भीमा कोरेगांव हिंसा की पड़ताल करता जाँच आयोग

इन सवालों के जवाब आज तक अधर में लटके हुए हैं, क्योंकि 2018 की भीमा कोरेगांव की हिंसा के कुछ एक-आध महीने बाद राज्य सरकार द्वारा गठित जाँच आयोग की रिपोर्ट का अभी भी इंतज़ार है. नीले झंडे थामे हुए महाराष्ट्र विधानसभा की ओर कूच करने वाले प्रदर्शनकारियों को दिलासा देने के लिए इस अर्द्ध-न्यायिक निकाय का गठन किया गया था. इसे न्यूनतम आवश्यक सुविधाएँ तक उपलब्ध न किए जाने के चलते अपनी जाँच शुरू करने में लगभग छः महीने लगे थे. आयोग की जाँच के दायरे में अन्य बातों के साथ-साथ, दो मुख्य बातें शामिल थीं. पहली, हिंसा के कारणों, उससे जुड़े घटनाक्रम और ज़िम्मेदार समूहों तथा व्यक्तियों की पहचान करना. दूसरी, हिंसा पर पुलिस की प्रतिक्रिया पर्याप्त थी या नहीं, इसका मूल्यांकन करना. सात-आठ साल बीत जाने और सोलह बार समय-सीमा बढ़ाए जाने के बाद, आयोग की सुनवाई अंततः फरवरी 2025 में समाप्त हो चुकी है.

हिंसक दंगे को अंजाम देने वालों के पीछे कथित षड़यंत्रकारियों मिलिंद एकबोटे और संभाजी भिड़े को गिरफ़्तार  करने के लिए आज लोगों की ओर से कोई वैसी ज़ोरदार मांग या दबाव दिखाई नहीं देता जैसा आयोग के गठन के समय था. हिंदुत्व संगठनों ‘समस्त हिंदू आघाड़ी’ और ‘शिव प्रतिष्ठान हिंदुस्तान’ के नेता क्रमशः मिलिंद एकबोटे और संभाजी भिड़े ने भीमा कोरेगांव स्मरण समारोह का लगातार विरोध किया है. एकबोटे और भिड़े इस वार्षिक सभा को हमेशा से देशद्रोही गतिविधि मानते रहे हैं, क्योंकि दोनों ही पेशवाओं के प्रशंसक रहे हैं. जबकि इस वार्षिक समारोह में पेशवाओं की, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से, निंदा लाज़िमी होती. दरअसल एकबोटे ने यह बात ‘समस्त हिंदू आघाडी’ के लेटरहेड पर 29 दिसंबर 2017 को पुणे ज़िलाधिकारी को लिखे अपने एक पत्र में कही थी. उसी दिन वढु बुद्रुक में हिंसा हुई थी. उन्होंने लिखा – “इस कार्यक्रम में बाजीराव पेशवे, नारायणराव पेशवे, माधवराव पेशवे जैसे पेशवाओं को बदनाम करना एक प्रवृत्ति बन गई है, जिन्होंने महाराष्ट्र के लिए उत्कृष्ट काम किया है. इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेशवाओं की गौरवशाली परंपरा का अपमान किया जा रहा है.”

2018 में भीमा कोरेगांव में इतिहास से जुड़े मुद्दे सचमुच दाँव पर लगे हुए थे. उस 1 जनवरी को समाज में स्पष्ट ध्रुवीकरण दिखाई दे रहा था. एक ओर सुनिश्चित भगवा दृष्टिकोण से की जाने वाली साम्प्रदायिक राजनीतिक व्याख्याओं के साथ हिंदू समाज का प्रभावशाली हिस्सा था. दूसरी ओर नव-बौद्ध समुदाय, जिसका प्रतिनिधित्व नीले अंबेडकरवादी झंडे कर रहे थे, साथ ही यहाँ-वहाँ पाँच रंगों में पंचशील ध्वज भी – मानवता के सम्यक पाँच सद्गुणों के प्रतीक. प्रशासन ने चतुराई से उस समय हिंदुत्व के पुरोधाओं की खाल बचा ली, चूँकि मुख्यमंत्री ने भिड़े को “सबूतों के अभाव” का हवाला देते हुए क्लीन चिट दे दी थी और एकबोटे को भी सिर्फ़ एक महीने की हिरासत के बाद न्यायिक जमानत मिल गई.

भीमा कोरेगांव में भीड़ की हिंसा के मामले में आयोग की सुनवाई अंततोगत्वा सितम्बर 2018 में शुरू हुई. कोलकाता उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जे एन पटेल इसके अध्यक्ष रहे और महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्य सचिव सुमित मलिक इसके दूसरे सदस्य. अब आयोग से यह उम्मीद की जाने लगी कि वह इस बहु-स्तरीय टकराव की परतें खोलेगा, जिसे पुलिस तंत्र के एक हिस्से ने हास्यास्पद रूप से माओवादी साज़िश का नतीजा बताने की कोशिश की.

आप याद कर सकते हैं कि कैसे 2018–2019 के दौरान राष्ट्रीय मीडिया में एल्गार परिषद मामले को लेकर हंगामा खड़ा कर दिया गया था. अगस्त 2018 में महाराष्ट्र पुलिस के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (क़ानून और व्यवस्था) परमबीर सिंह ने मामले में दूसरे दौर की गिरफ़्तारियों के तुरंत बाद बुलाई गई एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में मीडिया ट्रायल शुरू कर दी थी. उन्होंने एक अपराध-मूलक पत्र के अपुष्ट हिस्से को पढ़ कर सुनाया. यह दावा किया कि इसे इस केस के एक आरोपी रोना विल्सन के लैपटॉप से बरामद किया गया है. लेकिन बाद की फॉरेंसिक जाँचों से यह सामने आया कि रोना विल्सन का सिस्टम एक ऐसे मालवेयर का शिकार था, जिससे उनके लैपटॉप और बाहरी स्टोरेज डिवाइसों तक दूर से पहुँचा जा सकता था और मनचाहे तरीक़े से सबूतों को गढ़ा जा सकता था. लेकिन परमबीर सिंह ने निस्संकोच होकर विल्सन पर यह आरोप लगा दिया कि वे प्रतिबंधित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेताओं के साथ मिलकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साज़िश रच रहे थे, और इसके अलावा वे जंगलों में चल रहे छापामार युद्ध के लिए उच्च श्रेणी के हथियारों और गोला-बारूद की नामालूम कारणों से ख़रीदारी की कोशिशों में भी शामिल थे. पत्र मनगढ़ंत तो था ही. सरासर झूठी बातों को कुछ परिचित नामों और कहीं-कहीं विकृत तथ्यों के साथ मिलाकर तैयार किया गया यह पत्र उन्नत साइबर जासूसी तकनीकी के सहारे उनके सिस्टम में डाला गया था.

जनवरी 2025 में बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश से सुधीर ढवले और रोना विल्सन लगभग सात साल की क़ैद के बाद आखिरकार ज़मानत पर रिहा हुए. (फिर ज्योति जगताप, महेश राउत, हैनी बाबू, और हाल ही में रमेश गाइचोर और सागर गोरखे भी ज़मानत पर रिहा हुए). अभी अकेले सुरेंद्र गडलिंग अंदर हैं. तो क्या उनके लिए जेल की सलाखों के बीच की ठंडी खलाओं के पार कोई आशा की किरण दिखायी देने की उम्मीद की जा सकती है, जबकि उनके लिए न्याय का पहिया इंतहाई धीमी गति से चल रहा हो और असहनीय लंबी प्रतीक्षा के पल ख़त्म होते दिखायी ना देते हों?

फ़ोटो: निखिल घोरपड़े 

शायद आने वाला वसंत उम्मीद लेकर आये. जाँच आयोग के समक्ष दर्ज हुए समूचे साक्ष्य में, जिसे कि पॉलिस प्रोजेक्ट ने ग़ौर से देख लिया है, रत्ती भर भी ऐसा प्रमाण नहीं है जो भीमा कोरेगांव के हिंसक दंगे और एल्गार परिषद के बीच किसी तरह के संबंध को दर्शाता हो. वस्तुतः इस मनगढ़ंत कहानी में जो आरोप लगाए गए हैं, वे जिन पुलिस अधिकारियों के हैं उनका अधिकार-क्षेत्र पुणे शहर तक का ही था. हिंसा जिस ग्रामीण परिवेश से उभरी वहाँ उन्होंने कोई तफ़तीश कभी की ही नहीं है. कुल 53 गवाहों में से 13 पुलिस अधिकारियों ने आयोग के समक्ष अपनी गवाहियाँ दर्ज कीं और हलफ़नामे भी प्रस्तुत किए हैं. उनमें से एक भी अधिकारी यह नहीं बता सका है कि हिंसा का कथित कारण एल्गार परिषद और भीमा कोरेगांव व उसके आसपास के क्षेत्रों में उसके कथित परिणाम (जिसकी बाद में पुणे ज़िले और राज्य भर में प्रतिक्रिया हुई) के बीच कोई संबंध था.

आयोग के सामने गवाह नम्बर 48 एल्गार परिषद केस का जाँच अधिकारी, पुणे पुलिस के शिवाजी पवार थे, जिन्होंने 2018 जून के आरम्भ और अगस्त के अंत में बीके 16 में से संदेह का हवाला देकर 10 को गिरफ़्तार किया है. पवार ही पहली दो चार्जशीटों के लेखक भी हैं, जो 15 नवम्बर 2018 और 21 फ़रवरी 2019 को फ़ाइल की गईं. जाँच उसके बाद अगले साल एनआईए को सौंपी गई. शिवाजी पवार ने आयोग के सामने बहुत साफ़ तौर पर यह स्वीकार किया है कि 1 जनवरी 2018 को भीमा कोरेगांव के इर्द-गिर्द भड़कने वाली हिंसा के किसी भी चश्मदीद गवाह को वे नहीं पहचान नहीं सकते हैं. इस स्वीकारोक्ति का मतलब यह हुआ कि हिंसा का शिकार हुए और चश्मदीद गवाह रहे किसी का भी एल्गार परिषद से कोई ताल्लुक़ नहीं है. इससे यह साबित हो जाता है कि भीम कोरेगांव की हिंसा का एल्गार परिषद से कोई सम्बन्ध नहीं है. उन्होंने यह भी स्वीकार किया है कि एल्गार परिषद के बाद पुणे ज़िले के विभिन्न थानों में दर्ज हुए हिंसक दंगों की 36 FIRs को उन्होंने 8 जनवरी 2018 तक, जिस दिन विश्रामबाग पुलिस स्टेशन में सुधीर ढवले और अन्य के खिलाफ़ अजीबोग़रीब-सा मुक़दमा दर्ज किया गया, देखा तक नहीं था.

विश्रामबाग केस को यदि सही माना जाये, तो उससे निकले अनुमान के आधार पर, पुणे ज़िले के इनमें तीन मामलों में एल्गार परिषद के दौरान उकसावे के कथित षड़यंत्र के क्रम में, परिणति के तौर पर घटित हुए कृत्य दिखायी देने चाहिए थे. सच तो यह है कि आयोग के सामने आए उन 36 में से 33 केसों में मिलिंद एकबोटे के नेतृत्व वाले दक्षिणपंथी अतिवादियों को दोषी माना गया है और संभाजी भिड़े का नाम भी इसी रूप में कई बार आया है. सिर्फ़ शेष तीन मामलों में हिंसक दंगों के लिए दलितों को ज़िम्मेदार बताया गया है. और ये सभी 1 जनवरी के हिंसक दंगों के चंद दिनों बाद हुए जवाबी प्रदर्शनों से सम्बंधित हैं, न कि 1 जनवरी के हिंसक दंगों का अंग. इन तीनों मामलों का (पुलिस के आरोपों में भी) 31 दिसंबर 2017 की एल्गार परिषद के मंच से दिए गए भाषणों या अन्य किसी कार्यक्रम से, कल्पना की अंतिम हद तक भी, कहीं कोई संबंध जुड़ नहीं पाता है.

आयोग के सम्मुख जाँच के लिए प्रस्तुत हुए अधिकांश पुलिस अधिकारी हिंसक दंगे के कारणों को ठीक-ठीक चिह्नित करने में असफल रहे हैं. इस बात का भी उनके पास कोई जवाब नहीं था कि उन्होंने एल्गार परिषद की सामग्री, लहजे या अंदाज़ को लेकर एक भी आधिकारिक FIR क्यों दर्ज नहीं की थाई? वे यह भी नहीं बता सके कि निर्माण क्षेत्र के एक व्यापारी तुषार दामगुड़े की एक सामान्य निजी शिक़ायत कैसे एल्गार परिषद मामले का आधार बन गई और कैसे उसी के आधार पर 16 मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया गया.

दामगुड़े की शिक़ायत एल्गार परिषद में व्यक्त किये गए रैडिकल आंबेडकरवादी विचारों के प्रति एक धुर दक्षिणपंथी प्रतिक्रिया मात्र थी. शुरुआत में इसे भारतीय दंड संहिता की अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण धाराओं के तहत दर्ज किया गया, जैसे समूहों के बीच वैमनस्य पैदा करना और धार्मिक भावना को आहत करना, आदि. फिर कोई कारण ज़ाहिर हुए बग़ैर ही, वही साधारण-सी शिक़ायत आपराधिक साज़िश और UAPA के तहत संगीन अपराधों के आरोप लगाने की बुनियाद बना दी गई. उसी साल नवम्बर में दाखिल चार्जशीट में पुलिस ने राष्ट्रद्रोह और राज्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ने जैसे आरोप भी जोड़ दिए. इतने गंभीर आरोप लगाए जाने के बाद यह और भी ज़रूरी था कि अधिकारी ठोस तरीक़े से यह दिखाते कि शिक़ायत में दर्ज तथ्य, भीमा कोरेगांव में हुए हिंसक दंगे और एल्गार परिषद के कार्यक्रम के बीच कोई सुस्पष्ट कारण-कार्य संबंध है. लेकिन आयोग के सामने गवाही देने वाले अधिकारी हर क़दम पर ऐसा कोई संबंध बताने में नाकाम रहे. 

इसके बजाय, पवार ने अपनी यह राय दर्ज की कि यदि वे किसी भी प्रत्यक्षदर्शी की पहचान करने के लिए कोई क़दम उठाते, तो यह एल्गार परिषद मामले की पूरी अभियोजन प्रक्रिया के लिए घातक सिद्ध हो जाता. वर्तमान में मामले का अभियोजन एनआईए देख रही है. यह बयान इस बात की सीधी स्वीकारोक्ति होना चाहिए था कि एल्गार परिषद और भीमा कोरेगांव के बख़ूबी दर्ज हो चुके हिंसक दंगे के बीच कोई संबंध नहीं है. लेकिन इसके बजाय उनके इस बयान में एक धूर्त क़िस्म की चालाकी छिपी दिखायी देती है. 

असल में, आयोग के सामने रखे गए साक्ष्य यह दिखाते हैं कि भीमा कोरेगांव में हिंदुत्ववादी भीड़ की हिंसा दस्तावेज़ों में दर्ज है और इसकी पुष्टि न सिर्फ़ चश्मदीदों और पीड़ितों के बयानों से, बल्कि अलग-अलग लोगों के निजी मोबाइल फ़ोनों में रिकॉर्ड हुए वीडियो और सरकारी CCTV कैमरों की फ़ुटेज से भी होती है. वहीं दूसरी ओर, बीके 16 के ख़िलाफ़ जिस साज़िश का आरोप लगाया गया है, उसका आधार अनुमान से पैदा हुआ शक़ भी नहीं है. बीके 16 के ख़िलाफ़ लगा साज़िश का आरोप कहीं-कहीं तो महज़ ख़्वामख़्याली से उपजा है, पर उससे भी बुरा यह कि सायास झूठे, बनावटी सबूतों की रोपणी करके यह आरोप गढ़ा गया है. अपराध जैसा तो उनमें से किसी की ओर से कुछ घटा ही नहीं है. ऐसी स्थिति में, आपराधिक कानून के लिहाज से तो जिन लोगों ने झूठे, मनगढ़ंत आरोप लगाए हैं, उल्टे उन पर ही जाँच और मुक़दमा चलाने की ज़रूरत है.

मौजूदा साक्ष्यों को देखा जाये, तो इस मुक़दमे को दर्ज करने वाली राज्य सरकार के पास अब यह दावा करने की कोई ठोस ज़मीन ही नहीं बचती कि एल्गार परिषद की कथित साज़िश का किसी खास हिंसक वारदात से कोई संबंध था.

गोविंद गोपाल महार के वंशज, राजेंद्र गायकवाड़ ने अपने गांव वढु बुद्रुक में एक साईन बोर्ड लगवाया था, जो गाँव में स्थित उनके पूर्वज के स्मारक का रास्ता दिखाता था. 29 दिसंबर 2017 को, यानी भीमा कोरेगांव की हिंसा से थोड़े ही दिन पहले, एक हिंदुत्ववादी भीड़ ने उस बोर्ड को और स्मारक के ऊपर बने छज्जे को नष्ट कर दिया था. फ़ोटो: रितेश उत्तमचंदानी 

भीमा कोरेगांव की हिंसा का असली कारण 

जिन पुलिस अधिकारियों ने गवाही दी, उनमें से एक अधिकारी का बयान अपवाद की तरह सामने आया. इस अधिकारी ने, अनजाने में ही सही, अपनी गवाही में भीड़ की हिंसा के सटीक परिस्थितिजन्य कारण को उजागर कर दिया. यह गवाह है, उस समय के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक संजय पखाले, जिन्होंने वास्तव में पुणे ग्रामीण क्षेत्र में क़ानून-व्यवस्था के प्रबंध की निगरानी की थी. यह वही इलाक़ा था जहाँ 1 जनवरी 2018 को भीड़ ने हिंसा शुरू कर दी और वहीं से वह फैल गई. संजय पखाले ने कहा है कि, “29 दिसंबर को फ़्लेक्स बोर्ड हटाए जाने और उसके बाद ‘अत्याचार अधिनियम’ के अंतर्गत केस दर्ज हो जाने पर सामाजिक सौहार्द बिगड़ गया.”

पखाले जिस घटना का ज़िक्र कर रहे थे, वह वढु बुद्रुक गाँव में भीमा कोरेगांव की हिंसा के तीन दिन पहले हुई थी. घटनाओं के क्रम की पिछली कड़ियों की छानबीन से पता चलता है कि हिंसा की शुरुआत गाँव के नव-बौद्ध हिस्से में लगे एक साइन बोर्ड को लेकर हुई कट्टर दक्षिणपंथी प्रतिक्रिया से हुई. यह बोर्ड गोविंद गोपाल महार के स्मारक की ओर जाने का रास्ता बताता था. पूर्व में महार कहलाने वाले लोग अब अपने आपको हिंदू की जगह नव-बौद्ध कहलाना पसंद करते हैं. वे अपने इतिहास को लेकर बेहद मुखर और सजग रहते हैं. 

यह बोर्ड दलित निवासियों ने 28 दिसंबर की शाम को लगाया था. अगले ही दिन, सुबह 9 बजे उसी गाँव की ऊँची जातियों की भीड़ ने उस साइन बोर्ड को नष्ट कर डाला, जिसे गोविन्द महार के वंशज, उद्यमी राजेन्द्र गायकवाड़ ने लगवाया था. दो अम्बेडकरवादी स्वयंसेवकों ने साइनबोर्ड को शहर से गाँव लाने में गायकवाड़ की मदद की थी. इसके लिए ज़िम्मेदार इन तीनों व्यक्तियों में से कोई भी किसी ऐसी साज़िश का हिस्सेदार नहीं पाया गया है जो वढु बुद्रुक में शुरू हुई हिंसा को दो दिन बाद आयोजित एल्गार परिषद के केस से जोड़ती हो. 

आयोग के सामने रखे गए प्रभावशाली दस्तावेज़ों में से एक, वह ऐतिहासिक पुस्तक है, जिसे 1967 में महाराष्ट्र के प्रसिद्ध तर्कवादी प्रबोधनकार केशव ठाकरे ने प्रकाशित किया था. वे शिवसेना के संस्थापक दिवंगत बाल ठाकरे के पिता थे. किताब का नाम था – ‘शिवकालातिल शूरवीर महार योद्धे’ यानि ‘शिवाजी के काल के शूरवीर महार योद्धा.’ इस किताब में पूर्व-पेशवा मराठा काल के दो महार योद्धाओं गोविन्द गोपाल महार और रायनाक महार का जीवन परिचय है. यहाँ एक सशक्त विवरण मिलता है, जो यह बताता है कि मूल मराठा राजा शिवाजी और उनके पुत्र संभाजी जातिगत भेदभाव को मान्यता देना अनुचित मानते थे, खासकर राज्यसत्ता से जुड़े मामलों में, जिनमें सेना भी शामिल थी. 

इस पुस्तक में स्पष्ट तौर पर बताया गया है कि गोविंद गोपाल महार दरअसल संभाजी के सबसे भरोसेमंद सेनापतियों में से एक थे. इसमें यह भी लिखा है कि 1689 में, जब मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब ने संभाजी को पकड़कर उनकी हत्या कर दी, तो संभाजी की पत्नी येशुबाई के आदेश पर चले व्यापक खोज अभियान के दौरान गोपाल महार को संयोगवश भीमा नदी के किनारे राजा के मृत शरीर के अवशेष मिले. उन्हें इस बात की जानकारी भीमा नदी के तट पर कपड़े धो रही एक विधवा ने दी थी. वे जहाँ पर कपड़े धो रही थीं, उसके सामने नदी के उस किनारे पर वढु बुद्रुक के ठीक नीचे, किसी मृत शरीर के अंग फेंके हुए थे. एक अल्प ज्ञात लेखक, जिसकी पुस्तक ठाकरे ने प्रकाशित की थी, लिखता है कि कैसे गोपाल महार ने अपने कुछ भरोसेमंद साथियों को जुटा कर और आस-पास डेरा डाले मुग़ल सैनिकों के बड़े ख़तरे के बीच, राजा का अंतिम संस्कार गुप्त रूप से वढु बुद्रुक गाँव में कराया.

इत्तेफ़ाक़न, संभाजी के विश्वसनीय सेनापति गोपाल महार के जिन साथियों का ज़िक्र किताब में किया गया है, उनके उपनाम वही बताए गए हैं जो वढु बुद्रुक गाँव की ऊँची जाति के मराठाओं के उपनाम हैं. इससे पता चलता है कि उस वक़्त दलित महारों और ऊँची जाति के मराठों के बीच आपसी सहयोग ठीक-ठाक था. ठीक वही जगह अब जातिगत संघर्ष की जड़ बनी हुई है. इस छोटे से साक्ष्य से विद्वानों के उस अनुसंधान को बल मिलता है, जिससे महाराष्ट्र के फुले-आंबेडकरवादी अपने इन विचारों को ऐतिहासिक मान्यता का दर्जा दिला पाते हैं कि जातियों के बीच विभाजन पहले उतना गहरा और व्यापक नहीं था, जितना संभाजी की मृत्यु के बाद पेशवा काल में हुआ.

साईन बोर्ड जिस पुराने महार स्मारक को इंगित कर रहा था, वह गायकवाड़ के गाँव के घर के बाजू में स्थित था. इस साईन बोर्ड पर 1689 की घटनाओं का संक्षित विवरण भी लिखा हुआ था, कि कैसे सिर क़लम किए गए मराठा राजा का सम्मानजनक अंतिम संस्कार वहाँ से बस कुछ ही क़दम दूर किया गया. यह महार स्मारक गाँव में कब बनाया गया, यह बता पाना मुश्किल है. लेकिन वह किसी भी तरह से नया निर्माण तो बिल्कुल नहीं है, जिससे कि दिसंबर 2017 में गाँव के उच्च जाति के लोग अचानक इससे नाराज़ हो उठते. 

उपलब्ध साक्ष्यों के अनुसार 2015 में हटाये गए एक बड़े बोर्ड की जगह यह नया साइन बोर्ड लगाया गया था. उस साल वढु बुद्रुक में दो प्रमुख गुम्बद-नुमा स्मारकों का प्रबंधन एकतरफ़ा तरीक़े से एक निजी ट्रस्ट ने हस्तगत कर लिया था, जिसकी बागडोर ‘समस्त हिन्दू अघाड़ी’ के प्रमुख एकबोटे के हाथ में थी. इनमें से एक मराठा राजा संभाजी की समाधि थी और दूसरा उनके प्रसिद्ध मित्र कवि कलश की समाधि. 

मौजूद विश्वसनीय दस्तावेज़ों, जैसे एक आवेदन और राजस्व अधिकारियों के साथ किये गए पत्राचार, से पता चलता है कि पहले वाले बोर्ड (जो 2015 में हटाया गया था) पर यह बात लिखी थी कि संभाजी के अंतिम संस्कार करने वालों में गोविंद गोपाल महार के साथ-साथ उस समय के कुछ मराठा निवासी भी शामिल थे, जिनके उपनाम शिवाले-देशमुख और अरगाड़े थे. यानी पुराने बोर्ड में संभाजी के दाह संस्कार में दलित महार और मराठा, दोनों समुदायों की भागीदारी का उल्लेख था. आज संभाजी की समाधि पर जो बोर्ड लगा है, उसे एकबोटे और उनके स्थानीय समर्थकों द्वारा चलाये जा रहे ट्रस्ट ने लगाया है. इस बोर्ड पर सिर्फ़ शिवाले-देशमुख और अरगाड़े के नाम हैं. इसलिए गोविंद महार के नाम वाला एक अलग बोर्ड लगाना तर्कसंगत और ज़रूरी लगता है.

29 दिसंबर को, जिस दिन वढु बुद्रुक में हिंसा हुई, मिलिंद एकबोटे ने ‘समस्त हिंदू आघाड़ी’ के लेटरहेड पर पुणे ज़िला कलेक्टर को एक चिट्ठी लिखी. इस चिट्ठी में उन्होंने भीमा-कोरेगांव की सालगिरह मनाने का विरोध किया और दावा किया कि “इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेशवाओं की गौरवशाली परंपरा को अपमानित किया जा रहा है.” फोटो : निखिल घोरपड़े 

सबूत इतने स्पष्ट हैं कि न सिर्फ़ वढु बुद्रुक में, बल्कि कोरेगांव और सणसवाड़ी जैसे आसपास के गाँवों में भी मिलिंद एकबोटे, उनके संगठन और उनके गुर्गों की भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. आयोग को पेश किये गये बयानात से इन लोगों ने विवाद को भड़काने में और 2015 में लगे असली बोर्ड को हटवाने में जो भूमिका निभाई है, उसकी तफ़सील पता चल जाती है. इन गाँवों में अक्सर आने-जाने वाले और वहाँ प्रभाव रखने वाले संभाजी भिड़े की भूमिका भी इससे बहुत अलग नहीं मालूम होती.

29 दिसंबर को हिंसक भीड़ साइनबोर्ड तक ही नहीं रुकी, बल्कि आगे जाकर उन्होंने महार स्मारक की पवित्रता भी भंग कर दी और उस पर लगी छतरी को नष्ट कर दिया. बाद में पुलिस के हस्तक्षेप के बाद छतरी फिर से बनायी जा सकी. रेकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, जिससे कहीं से भी यह शक़ पैदा हो कि गाँव में किसी नव-बौद्ध की कोई अनावश्यक उकसावा पैदा करने की नीयत रही हो. हर साल की तरह 1 जनवरी को लोग कोरेगांव की जंग के शहीदों को श्रद्धांजलि देने से पहले या बाद में महार स्मारक पर भी आते. यही अपने आप में उस कम जाने जाने वाले महार स्मारक तक पहुँचने का रास्ता दिखाने वाला नया साइनबोर्ड लगाने के लिए पर्याप्त कारण था.

लेकिन वढु बुद्रुक में हुई हिंसा इस बात का निरपवाद उदाहरण है कि ऊँची जाति के मराठों का ब्राह्मणवादी हिस्सा दलितों की किसी भी तरह की अपनी इच्छा या पहचान को जताने के अधिकार को बर्दाश्त नहीं करता. वे यह बात भी बर्दाश्त नहीं कर सके कि नव-बौद्धों के किसी पूर्वज ने मराठा राजा संभाजी के शव को उठाया और अंतिम संस्कार करवाया, चाहे इसमें मराठों की मदद मिली हो या न मिली हो. ज़्यादातर मराठों को न सिर्फ़ तोड़ा-मरोड़ा इतिहास, बल्कि ब्राह्मणवादी हिंदुत्व के पुरोधाओं के इशारे पर पूरी तरह विकृत एक ऐसे नज़रिये पर विश्वास करा दिया गया है जिसमें यह मान लिया जाता है कि जाति की सारी दीवारें बिल्कुल प्राचीन, यहाँ तक कि प्रागैतिहासिक ज़माने से चली आ रही हैं, एक ऐसा यथार्थ जो सवालों से परे हो. 

इस विषय पर एक प्रामाणिक पुस्तक है, जो आयोग के रिकॉर्ड में शामिल नहीं है. यह वही विद्वानों का अनुसंधान है जिसका पहले उल्लेख किया जा चुका है. ‘Caste, Society and Politics in India from the Eighteenth Century to the Modern Age,’ इस नाम से प्रकाशित पुस्तक में इसके निषर्ष उपलब्ध हैं. लेखक हैं सुज़न बेली, जो केम्ब्रिज विश्वविद्यालय में ऐतिहासिक मानवविज्ञान की मानद प्रोफेसर हैं. बेली के अनुसार 17वीं सदी में शिवाजी और उनके पुत्र संभाजी के नेतृत्व वाले मावलों के मराठा शासन की तुलना में, 1700–1830 के “ब्राह्मण राज” में जातिगत पदानुक्रम अधिक जड़ हो गए थे, खासकर महाराष्ट्र के उन हिस्सों में जो पेशवा शासन के अधीन थे. विद्वतापूर्ण यह पुस्तक 1960 के दशक के उस मौखिक इतिहास के संकलन से मेल खाती है, जो प्रबोधनकार केशव ठाकरे ने प्रकाशित किया था, जबकि उनके पुत्र की शिवसेना अभी अस्तित्व में भी नहीं आई थी.

सवर्ण हिंदुत्ववादी पूर्वाग्रहों को आयोग के सामने संदर्भ सहित पेश किया गया. आयोग को सौंपे गये मराठी ऐतिहासिक साहित्य में इन बातों में से कुछ का विस्तार से उल्लेख किया गया है. इसमें मराठी मौखिक इतिहास-लेखन की और भी पुरानी परंपरा से निकला हुआ वो ब्यौरा भी शामिल है, जिसकी कुछ हद तक पुष्टि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विश्वसनीय माने जाने वाले इतिहासकार वी.एस. बेंद्रे भी वढु बुद्रुक में तीन समाधियों की अपनी पुरातात्विक खोज के बारे में लिखते हुए कर जाते हैं. इससे यह बात समझ में आती है कि कैसे संभाजी का मुग़लों के हत्थे चढ़ जाना भी शिवाजी और संभाजी के प्रति कथित ब्राह्मणवादी दुराग्रहों की भूमिका थी, और कैसे कुछ ब्राह्मण तो शिवाजी और संभाजी दोनों को ही शूद्र मानते थे; संभाजी जो वेद मंत्रों का धाराप्रवाह पाठ कर लेते थे उस पर भी उन्हें एतराज़ होता था.

रेकॉर्ड में मौजूद साहित्य के अनुसार इन्हीं ब्राह्मणों ने अंततः औरंगज़ेब से साठगांठ करके संभाजी को संगमेश्वर (रत्नागिरी) में पकड़वाने में मदद की. फलस्वरूप संभाजी की हत्या कर उनके शरीर के टुकड़ों को तुलापुर के आसपास फेंक दिया गया, जो वढु बुद्रुक के सामने नदी के उस पार स्थित है. इसके बाद संभाजी के बाद के दौर में, पेशवाओं की सत्ता हथियाने की कुचालों के क्रम में संभाजी और येशुबाई के पुत्र शाहू प्रथम ने तत्कालीन पेशवा बाजीराव प्रथम को बाक़ायदा सिंहासन सौंप दिया.

मिलिंद एकबोटे और संभाजी भिड़े (बीच में) हमेशा से ही भीमा कोरेगांव के जुटान को गद्दारों की गतिविधि मानते रहे हैं, क्योंकि वे दोनों पेशवाओं का गौरवगान करते हैं, जबकि भीमा कोरेगांव की वार्षिक स्मरण-सभा में पेशवाओं की निंदा की जाती है और उन्हें दोषी ठहराया जाता है. फोटो: निखिल घोरपड़े

वढु बुद्रुक की भीड़ ने भीमा कोरेगांव पर कैसे हमला किया

29 दिसंबर 2017 को वढु बुद्रुक में हुए घटनाक्रम पर अब वापस लौटते हैं. साईन बोर्ड हटाए जाने और गोविंद गोपाल स्मारक की पवित्रता भंग किए जाने के चलते सुषमा ओव्हाल नाम की एक दलित ग्रामीण ने देर शाम शिक्रापुर पुलिस स्टेशन में हिंसा की रिपोर्ट दर्ज कराई. ओव्हाल ने अपनी इस शिक़ायत में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत गाँव के 49 लोगों के नाम दर्ज कराए. इसमें एकबोटे पर वढु बुद्रुक में आकर ऊँची जाति के लोगों को भड़काने का आरोप दर्ज है.

इसके बाद घटनाएँ एक के बाद एक सामने आती गईं, जैसा कि चार पुलिस अधिकारियों ने आयोग को बताया. इस संबंध में अधिकारियों के बयानात कहीं-कहीं ज़रा-ज़रा सी किंतु उल्लेखनीय विसंगतियों को छोड़, क़ाफ़ी विश्वसनीय हैं. ये अधिकारी थे – आईपीएस अधिकारी संजय पखाले, पूर्व पुणे ग्रामीण पुलिस अधीक्षक सुवेज़ हक़, उप अधीक्षक गणेश मोरे और वरिष्ठ निरीक्षक रमेश गलांडे. उसी दिन शिक्रापुर थाने में एक दूसरे के खिलाफ़ कई तरह के मामले दर्ज हुए थे. अगले दिन ओव्हाल की एफआईआर में नामित सात लोगों को क़ानूनी बाध्यता के चलते गिरफ़्तार कर लिया गया. इसके बाद गाँव में दोनों समुदायों के बीच एक शांति समझौते पर हस्ताक्षर किये गये. लेकिन यह समझौता 1 जनवरी 2018 को कहीं अधिक बड़े पैमाने पर होने वाली घटनाओं के लिए सिर्फ़ एक झीना आवरण साबित हुआ. ऊँची जातियों की जातिगत पूर्वाग्रह भरी सोच वढु बुद्रुक के आसपास के गाँवों भीमा कोरेगांव से लेकर सणसवाड़ी तक फैल गई. ऊँची जाति के लोगों ने 1 जनवरी को “काला दिवस” मनाने का फ़ैसला किया, जिसका उद्देश्य भीमा कोरेगांव और वढु बुद्रुक के तीन स्मारकों पर पहुँचने वाले लाखों दलित-बहुजनों को भोजन, पानी और शौचालय जैसी सभी सुविधाओं से वंचित कर देना था.

30 दिसंबर की देर शाम से लेकर 1 जनवरी की सुबह तक भिड़े, एकबोटे और उनके गुर्गों द्वारा चलाये जा रहे अनेकों हिंदुत्व संगठनों के साथ जुड़े स्थानीय मराठा लोगों ने कम से कम छः भड़काऊ सोशल मीडिया पोस्ट फैलाये, जिनका उद्देश्य हिंसा भड़काना था. व्यापक रूप से प्रचारित सोशल मीडिया पोस्ट भीमा कोरेगांव में होने वाले कार्यक्रम के प्रति विरोध को निरंतर बढ़ाते गये, जैसा कि अपनी जिरह में पखाले ने माना. 

उधर पुलिस अधिकारियों ने जनवरी से पहले उमड़ रहे इस तूफ़ान के संकेतों के बारे में जानकर भी अनजान बने रहने का दिखावा किया. उन्होंने वे सारे ज़रूरी क़दम उठाये जाने का दावा किया कि ऊँची जातियों के जातिगत पूर्वाग्रह वाले लोग जिन आक्रामक भावनाओं को चुपचाप हवा दे रहे थे उनका किसी भी तरह का विस्फोट होने से रोका जा सके. पुलिस के अनुसार उन्होंने दो संवेदनशील स्थानों को चिह्नित कर पर्याप्त एहतियाती उपाय कर लिये थे – वढु बुद्रुक के स्मारक और पेरणे फाटा, जहाँ भीमा कोरेगांव का ऊँचा शहीद स्तंभ स्थित है. 

लेकिन इसके बावजूद अधिक विश्वसनीय सीसीटीवी रिकॉर्डिंग की जगह पुलिस द्वारा प्रस्तुत किये गये संपादित वीडियो क्लिप भी यह दिखाते हैं कि वहाँ ऊँची जाति की आक्रामक भीड़ को एकत्रित होने दिया गया. गलांडे और मोरे जैसे अधिकारियों ने हालांकि महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने के लिए बहुत कोशिशें कीं, फिर भी उन्होंने आक्रामक सवर्णों की भीड़ का अनुमान बड़ा – एक हज़ार बताया है. 1 जनवरी की सुबह लगभग 9 बजे वढु बुद्रुक में स्थित संभाजी स्मारक पर भगवा झंडे लिये, प्रेरणा मंत्र का उग्र, सांप्रदायिक जाप करते हुए भीड़ इकट्ठा हुई. इस भगवा टोली ने एक साथ, मालूम होता है, पूरे साढ़े तीन किलोमीटर तक मार्च किया. कुछ पैदल चल रहे थे, तो कुछ मोटर साइकिलों पर सवार. हाथों में अनगिनत झंडे लिये वे पूरे रास्ते में जातिवादी नारे लगाते हुए हुल्लड़ मचा रहे थे.

आसपास खड़े दलित लोग स्पष्ट तौर पर क्षुब्ध दिखाई दे रहे थे कि उनके उत्सव के दिन हिंदुत्व की दखल हो रही है. तभी वह चिंगारी भड़क उठी, जिसकी आशंका पहले से थी. एक अकेला युवक (जिसकी पहचान अभी तक नहीं हो पाई है) बड़े-से डंडे पर नीला झंडा लिये कोरेगांव-भीमा गाँव के वढु चौक के पास खड़ा हुआ भगवा झंडे लेकर चल रही भीड़ के सामने बिना सोचे-समझे अपना झंडा लहराने लगा. यह उसकी दोस्ताना भाव-भंगिमा थी, दुश्मनी थी या नासमझी, या फिर किसी ने चालाकी से उसे उकसाया था, यह कहना मुश्किल है. इस वाक़िये का उपलब्ध सबूत सिर्फ़ वे वीडियो क्लिप ही हैं जो राहगीरों और अन्य हमलों के पीड़ितों ने बनाये थे.

कुछ ही पलों में भगवा झंडे लिये चल रही उग्र भीड़ ने उस युवक को चारों ओर से घेर लिया और बेरहमी से उसकी पिटाई कर दी. इस घटना ने बाद में घटित होने वाली अंधाधुंध हिंसा की भूमिका तैयार कर दी. इस पूर्व नियोजित आक्रामक कार्रवाई के दौरान हिंदुत्व की भीड़ को डंडों और लोहे की रॉड से लोगों पर हमला करते देखा गया. छतों से पत्थर फेंके गये, जिसके लिए पत्थर निश्चित रूप से पहले से ही जमा किये गये होंगे. पेट्रोल से भरी हुई बोतलों और कैन का इस्तेमाल करके जगह-जगह आग लगायी गयी. वढु चौक से हिंसा कालांतर में चारों दिशाओं में फैलने लगी. पूर्व की ओर, जहाँ सड़क अहमदनगर हाईवे की तरफ़ जाती है; और पश्चिम की ओर, जहाँ भीमा नदी के पुल पर दलित युवाओं ने इसका मुक़ाबला किया, जो पुल शहीद स्मारक पर श्रद्धांजलि देने जाने वालों या वहाँ से आने वालों से पटा हुआ था.

 

फोटो: निखिल घोरपड़े 

भीमा कोरेगांव में भीड़ की हिंसा भड़क जाने पर वहाँ तैनात पुलिस कर्मी ना तो उतनी फुर्ती से काम कर पाये और न ही इस संभावना के प्रति पर्याप्त सतर्क थे. उन्होंने झगड़ते गुटों को क़ाबू में करने का प्रयास करने में बहुत देर कर दी. तुरंत अतिरिक्त पुलिस बल बुलाया गया, लेकिन रास्ते में ट्रैफ़िक जाम के कारण वह बहुत देर से पहुँचा. भीड़ की हिंसा देर शाम तक जारी रही. हजारों दलित इस बीच भागने की कोशिश करते रहे, जबकि कइयों के यातायात के साधन पूरी तरह से नष्ट हो चुके या आग के हवाले कर दिये गये थे. एक मराठा युवक राहुल फटांगले पर सणसवाडी में कुछ अज्ञात व्यक्तियों ने हमला कर दिया. उसे पुलिस टीम अस्पताल ले गयी, जहाँ घायल अवस्था में उसने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया. कुछ पीड़ितों ने आयोग को अपने बयानों में बताया कि क़ानून-व्यवस्था के लिए ज़िम्मेदार प्रशासनिक तंत्र की ओर से की गयी असामान्य देरी, जानकारी के आदान-प्रदान में तालमेल की कमी और किसी अप्रिय घटना को रोकने की स्पष्ट अनिच्छा के मंज़र में हिंसा, डर और आतंक देर रात तक जारी रहा. 

कुछ प्रत्यक्षदर्शियों की बातों से ज़ाहिर हुआ कि पुलिस ने लोगों को कठिन परिस्थितियों से निकलने में कहीं-कहीं सहायता भी की. लेकिन इस बात के सुबूत भी सामने आये कि ख़ास तौर पर शिक़ायत दर्ज करने, बयानों को रेकॉर्ड करने, और आम तौर पर क़ानूनी बाध्यता की अनदेखी कर, एफ़आईआर दर्ज हो जाने पर जाँच करने में लापरवाही और टालमटोल की गयी. ऐसा भी लगता है कि हिंसा को अंजाम देने वाले गिरफ़्तार लोगों को पुलिस के सायास टालमटोल से लाभ मिला होगा, क्योंकि पुलिस ने प्रभावी क़ानूनी कार्यवाई को अपने अंजाम तक पहुँचाने में जानबूझकर ढील दी.  

आयोग के सामने मौजूद साक्ष्य इस बात की प्रबल सम्भावना की ओर संकेत करते हैं कि भीड़ की हिंसा पहले से ही सोची-समझी और सुनियोजित तरीक़े से अंजाम दी गयी थी. इसमें मिलिंद एकबोटे की वढु बुद्रुक और भीमा कोरेगांव में की गई गतिविधियों; भीड़ के कुछ लोग उनके संगठन से जुड़े हुए होने; दोनों गाँवों की पंचायतों पर उनके नियंत्रण; और हिंसक मोड़ तक पहुँचाने वाली घटनाओं में उनकी सक्रिय भागीदारी के सबूत शामिल हैं. इस बात के स्पष्ट संकेत हैं कि 1 जनवरी 2018 के कार्यक्रम से पहले वैमस्यपूर्ण हिंदुत्व-पक्षी सोशल मीडिया पोस्ट फैलाने के ज़रिए भी साज़िश रची गई थी.

इस बात के भी साक्ष्य हैं कि स्मरण-समारोह के अवसर पर “काला दिवस” का आह्वान कर, आने वाले दलित-बहुजनों को सामाजिक बहिष्कार झेलने को मजबूर करने के लिए कुछ गाँवों की पंचायतों के नियम-पद्धतियों का उल्लंघन कर, दिखावे के तौर पर चालाकी से अपने हित में इस्तेमाल कर, गुप्त तरीक़े से “बंद” के प्रस्ताव पारित किये गये. इस बहिष्कार के ज़रिए से आने वाले लोगों को भोजन, चाय-नाश्ता-पानी, शौचालय और अस्थायी आश्रय जैसी बुनियादी आवश्यकताओं से इरादतन वंचित कर दिया गया. इतना ही नहीं, जिन स्थानीय दलितों ने इस “बंद” की अवहेलना कर, हर साल की तरह, समारोह के अवसर पर आने वालों को यही सुविधाएँ मुहैय्या कराने का साहस किया, उन पर प्रतिशोध-स्वरूपी हमले किये गये, यहाँ तक कि उनके घर और व्यवसाय भी आगजनी से और तोड़-फोड़कर गिरा दिये गये.

साक्ष्य यह भी बताते हैं कि भीड़ के हिंसक वारदात हो जाने पर सरकारी कार्यवाही इतनी धीमी और अधूरी थी कि यह शक़ पैदा होता है कि प्रभावशाली और अपेक्षाकृत संपन्न ऊँची जाति के धुर-दक्षिणपंथी समूहों के साथ निचले स्तर के अधिकारियों-कर्मचारियों की मिलीभगत थी. आम नागरिकों या पुलिसकर्मियों को आयी चोटों की बात करें या फिर मोटर साइकिलों, कारों और बसों को आग की भेंट चढ़ा देने समेत संपत्ति की व्यापक तबाही की, कुल मिलाकर नुकसान ज़्यादातर उन्हीं पुरुषों, महिलाओं, बच्चों और वरिष्ठ नागरिकों को भुगतना पड़ा जो कोरेगांव के शहीद स्मारक पर श्रद्धांजलि देने आये थे. अगर उचित राजकीय या पुलिस हस्तक्षेप हुआ होता, तो राह-किनारे स्थित स्थानीय दलितों की दुकानों और घरों में की गई तोड़फोड़ और प्रतिक्रिया में उनकी ओर से हुई छिट-पुट कार्रवाइयों को रोका जा सकता था.

हिंसा की शुरुआत और उसके प्रसार के पैटर्न से यह पता चलता है कि भीमा कोरेगांव और उसके आसपास के कुछ ख़ास व्यक्तियों की इसमें संलिप्तता थी. भीमा कोरेगांव समारोह से चंद दिन पहले एकबोटे ने शहीद स्मारक के पास स्थित होटल सोनाई में एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर स्मरण समारोह के प्रति अपने विरोध का ऐलान किया था. इसके बाद उसने पत्रकारों में अपने पर्चे वितरित किये, जो कि आयोग के रेकॉर्ड में शामिल होने के कारण निर्विवाद रूप से उसकी संस्था की विरोधी भूमिका साबित होती है. पीछे पलट कर देखें, तो सार के तौर पर यह निष्कर्ष निकलता है कि एकबोटे और भिड़े जैसे कुछ प्रमुख व्यक्तियों को एहतियातन हिरासत में ले लिया जाता, तो हिंसा को टाला जा सकता था. और तो और, हिंदुत्ववादियों की भीड़ ने उस दिन जिस विध्वंसक सामग्री का इस्तेमाल किया, उसकी शायद बरामदगी भी संभव हो जाती. दूसरी ओर, इस प्रशासनिक विफलता के चलते अल्प-सुरक्षित अंबेडकरवादियों को हिन्दुत्ववादी हमलों के ख़तरों से अपने नीले झंडे और नव-बौद्ध पंचशील ध्वज छिपा-छिपाकर चलने-दौड़ने को मजबूर होना पड़ा, जो कि उनकी सामाजिक पहचान और राजनीतिक संबद्धता के प्रतीक हैं.

लेकिन उस दिन झंडे तो बहुत सारे जला दिये गये. इस महा-छलावे पर तुर्रा यह कि पुणे पुलिस ने “माओवादी साज़िश” का मिथक खड़ा करने के लिए एक नामुराद निजी शिक़ायत के आधार पर केस दर्ज कर दी और उसमें हवा भर-भर कर गुब्बारे की शक्ल में फैला भी दिया. चाहे जो हो, आयोग के साक्ष्यों से यह साफ़ ज़ाहिर होता है कि जातिगत पूर्वाग्रहों से ग्रस्त, संविधान-विरोधी हिंदुत्ववादी साज़िशों के चलते भीमा कोरगांव में हुई भीड़ की हिंसा और संवैधानिक लोकतंत्र के प्रति समर्थन का यक़ीन दिलाते हुए आयोजित हुई जाति-विरोधी एल्गार परिषद के बीच कोई कार्य-कारण संबंध नहीं था. 

This article was originally published in English on February 27, 2025.

 

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Prashant Rahi is an electrical and systems engineer, who completed his education from IIT, BHU, before eventually becoming a journalist for about a decade in Uttar Pradesh and Uttarakhand. He was the Chairperson for Human Rights and Democracy at the annual Indian Social Science Congresses held between 2011 and 2013, contributing to the theorisation of social activists’ and researchers’ experiences. Rahi devoted the greater part of his time and energy for revolutionary democratic changes as a grassroots activist with various collectives. For seven years, he worked as a Correspondent for The Statesman, chronicling the Uttarakhand statehood movement, while also participating in it. He has also contributed political articles for Hindi periodicals including Blitz, Itihasbodh, Samkaleen Teesri Duniya, Samayantar and Samkaleem Hastakshep. From his first arrest in 2007 December in a fake case, where he was charged as the key organiser of an imagined Maoist training camp in a forest area of Uttarakhand, to his release in March 2024 in the well-known GN Saibaba case, Rahi has been hounded as a prominent Maoist by the state for all of 17 years. In 2024, he joined The Polis Project as a roving reporter, focusing on social movements.


Mouli Sharma is a scholar of religion at Jamia Millia Islamia and a freelance journalist from New Delhi. Her work has appeared in Nivarana, Think Global Health, Feminism in India, The Leaflet, and NewsClick. She is a published photojournalist & illustrator and has been featured in The Hindu College Gazette and the quarterly Pink Disco. She is the editor-in-chief of the student-run news site, The Voice Express, and is a literary editor for the digital lit-mag, The Queer Gaze.