हिंसा और वीभत्सता से ओत-प्रोत आधुनिक पौराणिक उपन्यास

In keeping with the mission of The Polis Project, Inc. to privilege voices of artists, writers, activists, thinkers, and scholars from all parts of the globe, we are releasing our first piece in one of India’s national languages, Hindi. Language has been a deeply contested terrain in India. The predominance of English in the framing of arguments about progressive voices and ideas in Indian society invisibilizes the strength of such arguments that emerge in local languages from scholars that seldom gain national or international prominence. It is our effort to find such writers and privilege and translate their work for a wider audience. In this piece Amita Chaturvedi, a scholar of Hindi literature from Agra and a writer on contemporary social issues talks about the use of ancient mythology in the crafting of the modern novel. She looks at the work of Amish Tripathi and Ashok K Banker to flag the following issues. First, she argues that these books depict violence (against outsiders and as war) in a romanticised manner thereby encouraging the cementing of faultlines in society on the basis of caste and exclusion. Second, she points out the manner in which outsiders are depicted as ugly, deformed and violent and/or demonic. Third, she contends that the representation of women in these novels is also negative pointing to an inherent misogyny in the making of the novel based on ancient mythology.

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धर्म और साहित्य का सम्बन्ध, आज एक नया रूप ले चुका है, जिसके फ़लस्वरूप पौराणिक कथाओं पर आधारित अनेक उपन्यास आजकल लोकप्रिय हो रहे हैं। इन उपन्यासों में पौराणिक पात्रों को नवीन परिवेश में रूपान्तरित कर, बड़ी ही कुशलता से; आज देश में आक्रामक रूप से हिंसा का प्रश्रय लेती हुई, धार्मिकता का लाभ उठाने का प्रयास किया जा रहा है। साथ ही, इनमें वर्णित ब्राह्मणवाद, जातिवाद, छूआछूत, असमानता और वर्गीय हिंसा तथा घृणा को विस्तृत रूप में व्यक्त किया जा रहा है जिससे इन विषमताओं के प्रबल होने की संभावनाएँ हैं । इस कारण आज समाज के पुनः, पुराने दौर में जाने की संभावना, दिन-प्रतिदिन बलवती होती जा रही है ।  ऐसे ही उपन्यासों में अमीश त्रिपाठी का ‘मेलुहा के मृत्युंजय’ और अशोक के. बैंकर का ‘अयोध्या का राजकुमार’ समाहित हैं।

मेलुहा के मृत्युंजय

‘मेलुहा के मृत्युंजय’ शिव नामक एक पात्र के जीवन पर आधारित है जिसमें उसे एक साधारण मानव के साथ-साथ, एक चमत्कारी रूप में भी चित्रित किया गया है। उपन्यास के प्रारम्भिक प्रसंग में ही, शिव के गाँव में बाहरी लोगों के घुस आने की घटना का विवरण है। ऐसे में सुरक्षा के लिए तैनात सैनिक को झपकी आ जाने पर; शिव के मित्र भद्र द्वारा उन्हें ‘जोर से ठोकर मारकर’ जगाने पर; शिव प्रसन्न होकर कहते हैं, ‘कम से कम वह कुछ जिम्मेदारियों का निर्वाह तो करता है।’ किसी के भी साथ, इस प्रकार का व्यवहार अमर्यादित है और इस पर शिव के प्रसन्न होने से अमीश त्रिपाठी गलत संदेश देते हैं। ऐसे ही अनेक प्रसंगों द्वारा यह उपन्यास, जातिवाद, हिंसक युद्ध, विकर्म की अवधारणा के साथ शुद्धीकरण आदि का प्रेषक बनता है।

जातिगत भेदभाव

अमीश त्रिपाठी ने जातिगत भेदभाव को विस्तृत रूप में चित्रित किया है। ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा सूर्यवंशियों को श्रेष्ठ और चन्द्रवंशी तथा नागाओं को निम्नतर बताया है। उपन्यास में किसी व्यक्ति की जाति स्पष्ट करने के लिए, उसके शरीर पर प्रतीक चिन्ह, बने होने का विवरण है। शिव के सन्दर्भ में लिखा गया है कि सती ने ‘बिना जाति सूचक चिन्ह वाले विदेशी को आँखें तरेर कर देखा जिसे उसकी औकात का पता नहीं था’। इस प्रकार शिव, जिन्हें उपन्यास में सबसे प्रमुख पात्र बनाया गया है, उसे भी जातिगत आधार पर पहचानने से बख्शा नहीं गया है।

ब्राह्मणों की श्रेष्ठता, अमीश त्रिपाठी ने इस प्रकार भी सम्पादित की है कि ब्रह्मा ने ‘त्रुटिहीन चरित्र’ वाले किशोरों को सोमरस देकर ब्राह्मण बनाया तथा उन्हें एक अतिरिक्त जीवन दिया। इसलिए उन्हें ‘द्विज अर्थात दो बार जन्म लेने वाला कहा गया’। इन ब्राह्मणों ने अपना जीवन ‘बिना किसी द्रव्य के लाभ की आशा किए; समाज की अच्छाई के लिए अर्पित कर दिया । आगे उपन्यास में वर्णित है कि ब्राह्मणों का यह समूह, ‘सम्पूर्ण इतिहास में सबसे शक्तिशाली समूह’ बन गया ।

चन्द्रवंशियों द्वारा ब्राह्मणों पर अत्याचार का चित्रण करते हुए त्रिपाठी ने लिखा है कि, ‘अंग-भंग किए हुए ब्राह्मणों के शरीर मंदिर के आस-पास बिखरे पड़े थे। उन्हें एक साथ इकट्ठा कर उनकी हत्या कर दी गई थी  और मंदिर तथा उसके परिसर को पूर्ण रूप से नष्ट कर दिया गया और सारे ब्राह्मणों की हत्या कर दी गई ।’ पौराणिक कहानियों में, इतिहास की भाँति साक्ष्य नहीं होते, इसलिए लेखक अपनी इच्छानुसार उनमें परिवर्तन कर सकता है, अमीश त्रिपाठी ने जिसका भरपूर लाभ उठाया है।

उपन्यास में मुख्यतः सूर्यवंशियों और चन्द्रवंशियों के मध्य मतभेद हैं । कहानी के अनुसार चन्द्रवंशी – ‘अविश्वासी लोग’ हैं, जिनसे बात करना, ‘अपनी आत्मा को गंदा करना’ जैसा है । वे आतंकी हमले करते हैं जिनमें उन्होंने ‘शापयुक्त नागाओं’ का प्रयोग किया है । वो युद्ध के नियम के बिना, ‘कायरों की तरह युद्ध करते हैं’ । उपन्यास में आगे वर्णित है कि स्वद्वीप के लोगों को उनके ‘चन्द्रवंशी शासक और उनकी जीवनशैली’ ने बुरा बना दिया । चन्द्रवंशी, ‘कुटिल, अविश्वसनीय और आलसी लोग है जिनके पास कोई विधि, नैतिकता और सम्मान नहीं है’ जो ‘मानवता के ऊपर एक धब्बा’ है ।

त्रिपाठी ने सूर्यवंशियों को स्वयं के लिए गर्व के साथ-साथ; उन्हें, चन्द्रवंशियों के प्रति हीन भावना से ओत-प्रोत दिखाया है । उपन्यास के एक प्रसंग में इसका उदाहरण देखने को मिलता है । इस प्रसंग में सूर्यवंशी राजा; चंद्रवंशी राजा को इस प्रकार का उपदेश देते हुए मिलते हैं – ‘हम आपको ऊँचा उठाकर हमारी श्रेष्ठ जीवन-शैली तक लाना चाहते हैं, ,…..… हम आप में सुधार लाएंगे’ । इस प्रसंग में जातीय-श्रेष्ठता का भाव निहित है । इसी प्रकार, एक और उदाहरण में त्रिपाठी ने चन्द्रवंशियों के संदर्भ में लिखा है कि, ‘उनके दुखी एवं अर्थहीन अस्तित्व से उनकी रक्षा और उन्हें उत्कृष्ट सूर्यवंशियों के जीवन के उत्तम ढंग के लाभ देकर, हम ऐसा कर सकते हैं’।

इस कार्य को उन्होंने ‘राम का अधूरा कार्य’ बताया है। उपन्यास के अन्त में भी, शिव के अयोध्या जाने का उल्लेख है । अयोध्या को स्वद्वीप की राजधानी बताया गया है, जहाँ चन्द्रवंशियों का शासन है । चन्द्रवंशियों के शासन को उत्तरदायी ठहराते हुए, वहाँ अतिक्रमण, मलिन बस्तियों, बेघर लोग, सड़कों में गड्ढे आदि जैसी आधुनिक समस्याओं का चित्रण किया गया है। इस प्रकार एक पौराणिक कहानी में आज के परिप्रेक्ष्य के सभी बिन्दुओं का समावेश किया गया है ।

अमीश त्रिपाठी ने, चन्द्रवंशियों के अतिरिक्त, नागाओं को भी अत्यंत हेय दृष्टि से चित्रित किया है। उनको शापित कहने के साथ-साथ, उन्हें, ‘जन्म से ही अपंग और विद्रूप’ और ’पूर्व जन्मों के पापों के कारण’ तरह-तरह के रोगों से ग्रस्त भी बताया गया है । उनको अपना ‘चेहरा देखने में भी शर्मिंदगी महसूस’ होने के साथ ही उनके ‘अतिरिक्त हाथ या अतिरिक्त भयानक चेहरे’ होने का विवरण भी किया गया है ।  उनके बारे में ‘कुछ बोलना भी दुर्भाग्य को लाता है’ और नागा का नाम मात्र ही, ‘आतंक का पर्याय’ है । इस प्रकार की टिप्पणियों के माध्यम से, नागाओं का निरन्तर अपमानजनक चित्रण किया गया है । उपन्यास में मुख्य पात्र – शिव; नागाओं को ‘अब ये गधे नागा लोग कौन हैं’ तक कहते हुए दिखाए गए हैं । इतिहास और वर्तमान काल में चन्द्रवंशी तथा नागाओं के वास्तविक अस्तित्व में होते हुए भी, उनका इस प्रकार का आपत्तिजनक चित्रण करना, कहाँ तक उचित है ?

जातिवाद का इस प्रकार का चित्रण जिसमें कुछ जाति या जनजाति विशेष के बारे में आपत्तिजनक विवरण देखने को मिलता है; ब्राह्मणवाद की मानसिकता का परिचायक है । उसके बाद उनके प्रतीक चिन्हों को महत्व देना, जातिवाद को और गहराई से व्यक्त करता है । आज की हिन्दुत्ववादी सोच से प्रेरित वातावरण में, यह चिन्ह, जातिगत भेदभाव से ग्रसित जन-समुदाय को प्रभावित करने के लिए पर्याप्त है । इन प्रतीक चिन्हों के चित्र भी अंकित किए गए हैं अर्थात इनके अनुसरण की भी पूरी व्यवस्था की गई है ।

चमत्कारिक एवं रीतिगत मान्यताएँ

मुख्य पात्र – शिव, के साधारण होते हुए भी उनके चमत्कारिक वर्णन द्वारा पाठकों की चमत्कार-प्रियता का लाभ उठाने का प्रयास किया गया  है । साथ ही समाज में रीतिगत मान्यताओं को उपन्यास में प्रमुख स्थान देने का एक उदाहरण, उपन्यास में वर्णित – ‘विकर्म’ की अवधारणा से मिलता है । त्रिपाठी ने ‘विकर्म’ के प्रसंग द्वारा सामाजिक भेदभाव के पक्ष में, एक प्रकार का तर्क देने का प्रयास किया है । उपन्यास के अनुसार ‘विकर्म’ वह है, ‘जिन्हें अपने पूर्व जन्म के पाप के लिए इस जन्म में दण्ड मिला है ।’ उदाहरणत:, यदि किसी स्त्री ने मृत बच्चे को जन्म दिया या कोई शारीरिक रूप से अपाहिज है तो उसे ‘विकर्म’ कहा जाएगा । ऐसा उसके साथ पूर्व जन्मों के पापों के फ़लस्वरूप हुआ । शिव की पत्नी, सती ऐसी ही एक ‘विकर्म’ स्त्री है जिसने एक मृत बच्चे को जन्म दिया ।

‘विकर्म’ की अवधारणा को उपन्यास में इस प्रकार उचित ठहराया गया है कि ‘यदि आप किसी व्यक्ति को यह विश्वास दिला देते हैं कि इस जन्म में उसका दुर्भाग्य उसके पूर्व जन्म के पापों के कारण ही है, तो वह खुद को भाग्य के भरोसे आत्म-समर्पण कर देगा और समाज के ऊपर अपना गुस्सा नहीं निकालेगा ।’ उपन्यास में ‘विकर्म’ व्यक्ति को छू लेने भर से, “शुद्धीकरण” के चलन की बात भी कही गई है ।

युद्ध और हिंसक चित्रण

उपन्यास में युद्ध का वीभत्स वर्णन है  जिसमें नृशंसता की पराकाष्ठा है । युद्ध को धार्मिक आयोजन से जोड़ कर महिमामंडित किया गया है । युद्ध के दौरान नगाड़ों के साथ, संस्कृत के श्लोक बोले जाते हैं । शिव भी मेलुहा के लिए लड़े गए युद्ध को उचित ठहराते हुए, इसे ‘धर्मयुद्ध’ और ‘पवित्र युद्ध’ कहते हैं और युद्ध का अर्थ ‘बुराईयों को समाप्त करना’ बताते हैं ।

उपन्यास में हिंसक युद्ध के अनेक प्रसंग हैं । एक प्रसंग में मुख्य नायक शिव की पत्नी सती ने, ‘अपने दाहिने हाथ को निर्दयता से तारक के सीने की ओर चला दिया। चाकू तारक के फ़ेफ़ड़े तक घुस गया । ……चाकू को और अन्दर चाकू की मूठ तक घोंपती गई।…… उसने चाकू को घुमाते हुए बाहर निकाल लिया ताकि घाव अत्यधिक घातक हो जाए ।’ हिंसा के इस वर्णन को उपन्यास में, आगे लिखी गई इन पंक्तियों के माध्यम से उचित ठहराया गया है – ‘बुराईयों के विनाशक शिव सिंहासन पर बैठे हुए एक मधुर मुस्कान से उसे देख रहे थे…यदि वरुणदेव ने भी इस द्वन्द युद्ध की पटकथा लिखी होती तो वह भी इतना आदर्श नहीं होता ।’

इसी प्रकार, शिव के सहायक पात्र भद्र के युद्ध लड़ने का चित्रण इस प्रकार किया गया है –  ‘अपने दाएँ हाथ को हवा में लहराकर दूसरे सैनिक के चेहरे को बीचोंबीच काटते हुए वार किया, जिसके कारण उसकी आँख बाहर निकल आई ।’ आगे उपन्यास में वर्णित है- ‘चीखते हुए शिव झुका और उस नागा के मृत शरीर को काटता चला गया जब तक कि उसके छोटे-छोटे टुकड़े नहीं हो गए ।’ युद्ध की विभीषिका को जानते हुए भी युद्ध के पक्ष में लिखना और उसका वीभत्स चित्रण, हिंसा को बढ़ावा और प्रश्रय देना है । 

अयोध्या का राजकुमार

“अयोध्या का राजकुमार” अशोक के. बैंकर द्वारा लिखित राम की कहानी पर आधारित पौराणिक उपन्यास है । अशोक के. बैंकर ने भी आज के हिंसक वातावरण के अनुकूल, पौराणिक उपन्यास के माध्यम से पाठकों को प्रभावित करने का प्रयास किया है जिसमें उन्होंने हिंसा के लिए उद्धत आज के समाज के लिए युद्ध का वीभत्स वर्णन किया है ।

उपन्यास का आरम्भ ही भयानक और भड़काऊ प्रसंगों से होता है। उदाहरण स्वरूप – ‘तुम्हारी महिलाओं का बलात्कार हुआ, तुम्हारे बच्चों को दास बना लिया, तुम्हारे नगर को लूटा और जला कर राख कर दिया … तुम्हें जन्म देने वाली माँ को इतना क्षत-विक्षत कर देंगे कि उन्हें पहचान नहीं सकोगे । तुम्हारे कुल की माताओं और बहनों को मेरे राक्षस गर्भवती कर देंगे, तुम्हारे पिता और भ्राताओं को जीवित खा लिया जाएगा ।’  एक पौराणिक कहानी में ऐसी बातें अत्यन्त अप्रासंगिक और निंदनीय हैं । लेखक ने आजकल के वातावरण की प्रतिछाया को उपन्यास में प्रस्तुत कर दिया है जिससे पाठकों की मानसिकता के बिगड़ने की सम्भावना है ।

हिंसा और वीभत्सता

कहानी में अनावश्यक रूप से हिंसा और वीभत्सता उत्पन्न की गई है । कहानी के अनुसार, अयोध्या के महल के तलघर में अपराधियों को बन्दी बनाया जाता था,  जहाँ  हर तरफ़ गहरे दाग और निशान थे । लेखक ने ‘कारागार में बन्दियों के कटे हुए हाथों को हथकड़ियों में जकड़े होने का’ अत्यन्त वीभत्स चित्रण किया है, “जिनसे एक गन्ध आ रही थी…जो सदियों तक यहाँ बन्द किए गए थे ।’

युद्ध का चित्रण हिंसक है । उपन्यास में वर्णित, राम-लक्ष्मण, ‘अपनी तलवार उसी प्रकार घुमा रहे थे जैसे कोई किसान अपनी फ़सल काटता है। अन्तर यही था कि उनकी तलवार से रक्त की पैदावार निकल रही थी। शरीर के अंगों, मांस-पेशियों, रोएँ, पूँछ और ऐसे अंग कट कर हवा में उड़ रहे थे जिन्हें उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था ।’ वहीं राक्षसों के संदर्भ में वह लिखते हैं कि, ‘राक्षस, मानव सैनिकों के पेट फ़ाड़ रहे थे तथा भाप छोड़ती अंतड़ियों को अपने भूखे मुख से चूस रहे थे ।’

स्त्री पात्रों का अस्वाभाविक एवं पूर्वाग्रही चित्रण

बैंकर ने उपन्यास में जिन स्त्री पात्रों का चरित्र बुरा दिखाया है, उनका बहुत अस्वाभाविक और विचित्र चित्रण किया है। मन्थरा, तन्त्र-मन्त्र करती, भयानक सोच वाली एक स्त्री के रूप में चित्रित है । उपन्यास के एक प्रसंग में मन्थरा;  कैकेई को पान में एक ब्राह्मण बालक का रक्त डाल कर देते हुए उससे कहती है, ‘हाँ, मेरी प्यारी बच्ची। एक छोटे ब्राह्मण बालक का रक्त । वह जिसकी बलि लंका के नरेश ने मेरे पिछले यज्ञ में दी थी’।

ताड़का के चरित्र चित्रण में तो पराकाष्ठा है, जिसके बारे में लेखक ने लिखा है कि, ‘उसने अपनी सेना का सृजन… वन के जानवरों और अपने राक्षस पुत्रों के संभोग’ द्वारा किया है । युद्ध के दौरान शूपनखा का उपन्यास में अधिकांशतः जानवर के रूप में विचित्र और घिनौना चित्रण किया गया है। उदाहरण स्वरूप – ‘शूपनखा ने अपने आप को चाटकर साफ़ किया । मनुष्यों के रक्त का स्वाद नमकीन और अमलीय था…गला काटने और पेट फ़ाड़ने के दौरान यह स्वाद मुँह में चला जाता था’। किसी चरित्र को बुरा दिखाने का यह तात्पर्य नहीं होना चाहिए कि उसकी गतिविधियों का इस प्रकार चित्रण किया जाए ।

वहीं, स्त्रियों के लिए टिप्पणी की गई है – ‘सोम, जुआ और ॠण के साथ ही; स्त्रियाँ योद्धाओं की दुश्मन होती हैं’ क्योंकि पुरूष इनके पीछे ‘हताशा की सीमा तक’ पागल हो जाते  हैं । यह वर्णन आमतौर पर स्त्रियों के प्रति पूर्वाग्रही सोच को प्रस्तुत करता है ।

निष्कर्ष

आज, समाज में जिस तरह की जातिवाद और धार्मिक कट्टरता की भावना बढ़ती जा रही है, उसी के अनुरूप, इन पौराणिक उपन्यासों को आधुनिक परिवेश में ढाल कर, लोकप्रिय बनाने का प्रयास किया जा रहा है,  भले ही समाज में इसका संदेश, गलत रूप में ही प्रस्तुत क्यों ना हो रहा हो । एक प्रकार से ऐसे साहित्य में सम्पूर्णतः पुनरुत्थान की भावना निहित है, जो आज के समय में अपने कदम बढ़ा रहा है और समय को पीछे धकेल रहा है ।

‘मेलुहा के मृत्युंजय’ उपन्यास, सही मायनों में पौराणिक न रहते हुये; जातिवाद की व्याख्या का तीव्र संवाहक है। वहीं, पहले से ही समाज में व्याप्त छूआछूत, ऊँच-नीच तथा हिंसा के वातावरण को और प्रोत्साहित किया गया है । इसी प्रकार, अशोक के. बैंकर के उपन्यास में, हिंसक युद्ध का वीभत्स वर्णन तथा बुरे चरित्र के पात्रों का अनावश्यक रूप से अमानवीय चित्रण प्रस्तुत किया गया है । युद्ध की इस प्रकार की हिंसक तथा वीभत्स प्रस्तुति से समाज अशान्त होकर विनाश को ही प्राप्त हो सकता है । दोनों ही उपन्यासों में जातिभेद, वर्गभेद, चमत्कारिता, अवैज्ञानिक सोच, हिंसा, वीभत्सता आदि बुराइयों को एक प्रकार से पोषित किया गया है ।      

अमिता चतुर्वेदी 

In translation 

Modern Interpretations of Religion and Violence in Contemporary Mythological Novels

The relationship of religion and literature has undergone a transformation in present times because of which there has been a rise in the popularity of novels based on myth. Mythological characters are being presented in a new avatar in these novels and thus, quite skilfully, an attempt is being made to cash in on a specific kind of religiosity prevalent in the nation – one which is aggressively backed by a culture of violence. Besides, these novels also narrate in great detail the practices of Brahmanism, casteism, untouchability, inequality, sectarian violence and hatred, which potentially can create grounds for the escalating of these maladies in modern society. As a result, the looming danger of society regressing into old values is becoming more real by the day. Amish Tripathi’s The Immortals of Meluha and Ashok K Banker’s Prince of Ayodhya are two such novels.

The Immortals of Meluha

The Immortals of Meluha is based on the life of a character named Shiva, who is depicted as an ordinary man yet is endowed with magical powers. In the opening extract of the novel, there is an incident where outsiders have intruded Shiva’s village. During this time, when the back-up soldiers were caught dozing, Shiva’s friend Bhadra kicks them hard to which Shiva responds, “At least he takes some responsibility” in a calm and assured manner thereby showing Shiva’s pleasure. With many such incidents, this novel becomes a conveyor of casteism, violence in wars, notions of ‘Vikarma’ as well as purification.

Discrimination based on Caste

Amish Tripathi has depicted discrimination based on caste in a detailed fashion. He has shown Brahmins, Kshatriyas and Suryavanshis (Descendants of Sun) as superior while Chandravashis (Descendants of Moon) and Nagas are inferiors in this mythological universe. There are references to people being marked with their caste symbols on their bodies to highlight their caste identities in the novel. With reference to Shiva it has been written that Sati, “took offence at this caste-unmarked foreigner pretending that he knew more about dancing than her mistress”. Thus even Shiva, who is the main character of the novel, has not been spared from caste-based identification.

Amish Tripathi establishes the superiority of Brahmins in a specific way. He writes that Brahma had administered ‘Somras’ (a magical potion) to a select group of adolescent boys with “impeccable character” and thus granted them an extra life. Thus, they came to be known as ‘Dvija’ or twice-born. These Brahmins “devoted their lives to the pursuit of knowledge and for the well-being of society without asking for any material gain in return”. Further in the novel it has been mentioned that this group of Brahmins went on to achieve “a reverential status never seen before”.

With reference to the atrocities committed by Chandravanshis on Brahmins, Tripathi writes “Decapitated bodies of the Brahmins lay around the shrine. They had been gathered together and executed. The temple itself was ruthlessly destroyed and set aflame.” There is lack of historical evidence in mythological stories, which allows the author to make modifications to these stories, a scenario amply exploited by Amish Tripathi.

The central arc of the novel is based on the feud between Suryavanshis and Chandravanshis. The description of Chandravanshis in the novel reads as “untrustworthy people”. It adds, “No follower of the Suryavanshi way of life will sully his soul by even speaking to a Chandravanshi willingly.” They indulge in terrorist attacks in which they use the term “cursed Nagas”. Rather than following rules of the war, they “fight like cowards”. Further in the novel it is mentioned that the “Chandravanshi rulers and their way of life” has corrupted the people of ‘Swadeep’ (an imaginary place) and made them evil. Chandravanshi are “a crooked, untrustworthy and lazy people with no rules, morals or honour” and are a “blot on humanity”.

Alongside depicting Suryavanshis as a group that has instilled self-pride, the author has also shown their perception of Chandravanshis as inferior. This is illustrated in one of the extracts of the novel. In this extract the Suryavanshi king; is shown lecturing his Chandravanshi counterpart thus, “We are going to bring to you our superior way of life… We are going to reform you”. The sense of casteist superiority is explicit in this extract. Similarly, in another extract Tripathi writes in the context of Chandravanshis, “Save them from their sorry, meaningless existence. And we can do this by giving them the benefits of the superior Suryavanshi way of life”.

This he has described as “Lord Ram’s Unfinished Task”. Even towards the end there is a mention of Shiva heading towards Ayodhya. Ayodhya has been described as the capital of Swadeep, the empire administered by Chandravanshis. Holding them accountable for the bad governance there, modern day problems such as illegal occupation, slums, homelessness, potholes in roads etc. have been illustrated. Thus, in a mythological story, all the issues from a modern-day scenario have been included.

Besides Chandravanshis, the books also depict Nagas negatively. They have been described as being cursed with “horrific deformities and diseases in this birth as a punishment for terrible crimes that they have committed in their previous birth”. They have been shown to be “embarrassed to even show their face to anyone” as well as possessing “extra hands or horribly misshapen faces”. As per the story “it is bad luck to even speak of them” and “The Naga name alone strikes terror in any citizen’s heart”. Through such comments, there has been a consistent humiliating portrayal of Nagas. The central character Shiva has also says, “Now who the bloody hell are the Nagas” with reference to them. Chandravanshis and Nagas being in existence in reality in the history as well as in present times, how is such an insulting portrayal of them justifiable?

Such an illustration of casteism where some castes or tribes have been objectionably depicted; is symptomatic of a Brahaminical mentality. Furthermore, giving importance to their caste symbols, further deepens the casteist nature of this depiction. This kind of symbolism, in today’s climate inspired by Hindutva ideology, is enough to make a lasting impression upon a society already inclined to caste-based discrimination. These symbols have even been illustrated in the book, thus fully ensuring that they can be followed in reality.

Magical and Traditional Beliefs

By depicting the main character Shiva as an ordinary man and yet portraying him as capable of miracles, there has been an effort to cash in on readers’ love for magic and miracles. Besides, the concept of ‘Vikarma’ mentioned in the novel provides an example of how traditional belief systems have been given importance in the book. By using the concept of ‘Vikarma’, Tripathi has tried to make an argument in favour of social discrimination. According to the story, ‘Vikarma’ are those people “who have been punished in this birth for the sins of their previous births”. For instance, if a woman has given birth to a still-born child or if someone is physically disabled, then they shall be called ‘Vikarma’. Their present condition is a result of their bad deeds from previous lives. Shiva’s wife Sati is one such ‘Vikarma’ woman, who had given birth to a still-born child.

The idea of ‘Vikarma’ has been justified in the novel by suggesting that “If you make a person believe that his misfortune in this birth is due to his sins in his previous birth, he will resign himself to his fate and not vent his fury on society at large”. The novel also mentions that if someone even touches a ‘Vikarma’ person, they need a “purification” ritual performed.

War and Violent Portrayals

The portrayal of war in the novel is gory. War has been romanticised by linking it with religious themes. Along with beating of drums, shloks (hymns) in Sanskrit are recited during the wars. Shiva too deems the war as essential by terming it as “dharmayudh” or “holy war”, and states that war is required for “destruction of evil”.

There are many extracts of violent wars in the novel. In one instance the central character Shiva’s wife, Sati engaged in a battle with Tarak is described to have “brought her right hand in brutally onto his chest. The knife pierced Tarak’s lung dug the knife in deeper, right up to the hilt She pulled the knife out, slowly twisting it to inflict maximum damage”. This kind of description of violence in the novel has been justified ahead in the novel- “Shiva, the destroyer of evil, sat on his throne, staring at her with a slight smile… Even if Lord Varun himself had scripted the fight, it wouldn’t have been so perfect”.

Similarly, Shiva’s assistant Bhadra’s fighting in the war has been described in this manner – “he swung with his right hand, cutting across the face of the other soldier, gouging his eye out.” Further, in the novel it is mentioned: “Screaming, Shiva bent down and kept hacking at the Naga’s inert body, ruthlessly slashing it to bits.” Knowing the horrors which war entails, to write in its favor and describe it so gorily, is tantamount to encouraging violence and supporting it.

Prince of Ayodhya

‘Prince of Ayodhya’ is a mythological novel based on the story of Rama. This novel too views Rama’s violence positively as a collection of acts undertaken to rid society of evil. In doing so, it echoes the present climate of violence in Indian society.

The beginning of the novel is strewn with horrific and incendiary extracts. For instance- “Your women were raped, your children were enslaved, your city was looted and burnt to ashes… The mother who has given birth to you will be mutilated to such an extent that you won’t be able to identify her. The mothers and sisters of your family will be impregnated by my monsters, your fathers and brothers will be eaten alive”. Such descriptions in a mythological novel are not only irrelevant but also extremely deplorable. The author has reproduced the shadow of present day climate in the novel, an equation which has the potential to mislead or corrupt the mindsets of readers.

Violence and Heinousness

There has been an unnecessary infusion of violence and heinousness into the story. According to the story, in the basement of Ayodhya’s palace where the convicts were imprisoned, there were lasting blots and marks. The author has gruesomely described that the “severed hands of prisoners still caught in the shackles in the prison”, “which reeked of a foul stench… were kept here for ages”.

The depiction of the war is violent. Rama and Lakshmana in the novel have been described as “waving their swords much like a farmer cuts his crop. The difference was that their swords were reaping the crops of blood. Body parts, sinews, hairs, tails and other parts were flying in the air after being cut in a manner never seen before”. On the other hand, he also writes “Monsters were tearing apart the stomachs of human soldiers and were sucking with their hungry mouths the intestines which were emanating steam”.

Abnormal and Prejudiced Depiction of Women

Banker has written a very abnormal and strange description of the female characters in the novel whom he has sought to show in a bad light. Manthara has been depicted as a woman who deals in black magic and possesses a very horrific mindset. In one of the extracts in the novel, Manthara; whilst making a pan (refreshment made out of beetle leaves) for Kaikai adds the blood of a Brahmin child and says “Yes my dear child. The blood of a small Brahmin kid. The same one who was sacrificed by the king of Lanka in my previous yajna (ritual)”.

There is an unusually gruesome description of Tadaka, for whom the author has written, “She created her army… through sexual intercourse between the animals of jungle and her monster offspring”. Shroopanakha during the war has been mostly depicted in the novel as an animal in a strange and disgusting manner. For instance- “Shroopanakha licked herself clean. The taste of human blood was salty and tangy… the taste would get into the mouth while severing heads and tearing apart the stomachs”.

At the same time, there has also been a commentary about women which says “Besides alcohol, gambling and debt; women are the enemies of warriors” as men become infatuated with them “to the extent of insanity”. This kind of stereotypical depiction represents ordinary prejudices against women.

Conclusion

Today, as the levels of casteism and religious fundamentalism are rapidly increasing in the society, much in the same fashion, these mythological novels are being molded in a modern environment, to make them popular, even if this sends a wrong message to society. In a way there is an intent of complete revival of the regressive past inherent in such literature, which is further creeping up in present times and pushing back time towards the past.

The Immortals of Meluha in fact rather than remaining a mythological story; becomes a strong messenger of casteism. At the same time, the prevalent practices of untouchability, inequality and climate of violence in the society have been further encouraged. Similarly, Ashok K Banker’s novel is full of heinous description of violence in wars as well as extraordinarily inhuman portrayal of the intended bad characters. Such a heinous and violent portrayal of war can only lead society to unrest and social decline. In a way, in both the novels, casteism, class differences, unscientific thinking, belief in magic, violence, heinousness and other such social maladies have been nurtured.

Amita Chaturvedi holds an MPhil degree in Hindi Literature from Dr. BR Ambedkar University, Agra. As an independent writer, she writes on literature and society and maintains a blog by the name of apnaparichay.blogspot.com.

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